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Torai ki kheti : तोरई की खेती किसानों के लिए हमेशा से फायदे का सौदा रही है. गोंडा के एक किसान ने तो इसे उगाने के लिए पारंपरिक खेती ही छोड़ दी. लोकल 18 से गोंडा के प्रगतिशील किसान शिवकुमार मौर्य बताते हैं कि आज वह इससे हर साल लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं. उन्होंने कम क्षेत्र में तोरई की खेती शुरू की थी. धीरे-धीरे रकबा बढ़ता गया. शिवकुमार मौर्य बताते हैं कि तोरई की फसल 45 से 50 दिन में तैयार हो जाती है. कई महीनों तक लगातार तुड़ाई होती रहती है.
गोंडा. तोरई एक ऐसी सब्जी है जिसकी डिमांग हमेशा बनी रहती है. कई घरों में तो हर दूसरे-तीसरे दिन ये बनती ही रहती है. यही वजह है कि इसकी खेती हमेशा से फायदे का सौदा रही है. यूपी स्थित गोंडा जिले में आने वाले विकासखंड नवाबगंज के देवी नगर के एक किसान ने इसे उगाने के लिए पारंपरिक खेती छोड़ दी. आज वह इससे हर साल लाखों रुपये की कमाई कर रहा है. लोकल 18 से गोंडा के प्रगतिशील किसान शिवकुमार मौर्य बताते हैं कि उन्होंने शुरुआत में कम क्षेत्र में तोरई की खेती शुरू की. अच्छा उत्पादन और बेहतर दाम मिलने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे खेती का रकबा बढ़ा दिया. इस समय लगभग एक बीघा में तोरई की खेती कर रहे हैं. उनकी फसल आसपास के बाजारों के साथ दूसरे जिलों में भी जाती है. शिवकुमार मौर्य बताते हैं कि तोरई की फसल 45 से 50 दिन में तैयार हो जाती है. इसके बाद कई महीनों तक लगातार तुड़ाई होती रहती है. इस फसल में यदि समय पर सिंचाई, खाद और कीट नियंत्रण किया जाए तो उत्पादन बढ़ सकता है.
कौन सी वैरायटी
शिवकुमार मौर्य के मुताबिक, हम देसी वैरायटी के तोरई की खेती कर रहे हैं. इस तोरई का बीज हम नेपाल के एक किसान से मांगते हैं. नेपाल का किसान खुद बीज को शोधित करता है और उसका बीज देसी होता है. वह गोंडा के वातावरण में काफी अच्छा सरवाइव कर रहा है. पैदावार भी अधिक है. शिवकुमार बताते हैं कि इस समय लगभग एक बीघा में तोरई की खेती कर रहे हैं. भविष्य में इसको और आगे बढ़ाना है. एक बीघा में ढाई से 3 हजार रुपये की लागत लगी है.
कितना मुनाफा
शिवकुमार मौर्य बताते हैं कि तोरई की खेती से सालाना हमारा अच्छा खासा इनकम हो जाता है. 3000 लगाकर मात्र 6 महीने में हम 50 से 60 हजार रुपये कमा लेते हैं. यह इनकम मंडी के रेट पर निश्चित करता है. कभी-कभी मुनाफा इससे अधिक भी हो जाता है और कभी-कभी कम भी हो जाता है. हालांकि तोरई की खेती में लागत की तुलना में मुनाफा अधिक है. इसी वजह से अब आसपास के कई किसान भी उनकी सलाह लेकर तोरई की खेती शुरू कर रहे हैं.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें