Last Updated:
Biawan Ki Kothi: बरेली के सिविल लाइंस स्थित ‘बियावान की कोठी’ का इतिहास बेहद दिलचस्प है. 1870 में आए एक साधारण मुनीम गोपीनाथ के बेटों ने अपनी अंग्रेजी के दम पर अंग्रेज कलेक्टर से जंगलात के बड़े ठेके हासिल किए. इसी तरक्की के बाद घने जंगलों (बियावान) के बीच इस भव्य कोठी का निर्माण हुआ, जिसने आगे चलकर नेकपुर से धामपुर शुगर मिल तक का विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़ा किया.
Biawan Ki Kothi: वक्त बदला, दौर बदले, लेकिन इतिहास की गवाही देती इमारतें आज भी अपनी कहानी खुद बयां करती हैं. बरेली के सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित ‘बियावान की कोठी’ भी एक ऐसी ही ऐतिहासिक धरोहर है. यह सिर्फ ईंट-गारे से बनी एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि शून्य से शिखर तक पहुंचने वाले एक परिवार के संघर्ष, व्यापारिक साम्राज्य और बरेली के औद्योगिक विकास की जीवंत पहचान है. अपनी भव्य वास्तुकला और गौरवशाली अतीत के कारण यह कोठी आज भी शहर की सबसे प्रमुख विरासतों में शुमार है.
मुनीम से शुरू हुआ था कामयाबी का सफर
इतिहासकार डॉक्टर राजेश कुमार शर्मा ने लोकल 18 को बताया कि वर्ष 1870 के आसपास गोपीनाथ जी बरेली आए और उन्होंने एक साधारण मुनीम के रूप में अपना जीवन शुरू किया था. अपनी कड़ी मेहनत और दूरदर्शिता के बल पर उन्होंने अपने तीनों बेटों को उच्च शिक्षा दिलाई और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान भी कराया. उस दौर में, जब अंग्रेजी जानना बहुत कम लोगों के लिए संभव था, तब यही आधुनिक शिक्षा उनके परिवार की तरक्की का सबसे मजबूत आधार बनी.
अंग्रेजी भाषा ने बदली किस्मत, मिले जंगलात के ठेके
इतिहासकार डॉक्टर राजेश के अनुसार, उस समय अंग्रेज कलेक्टर जंगलों के ठेके आवंटित कर रहा था. उनके यहां गोपीनाथ मुनीमी का काम करते थे, लेकिन उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी, जिससे कलेक्टर नाराज हो गया था. दूसरी ओर, गोपीनाथ के बेटे अंग्रेजी में बातचीत करने में पूरी तरह सक्षम थे. उनकी इस योग्यता से प्रभावित होकर अंग्रेज अधिकारी ने जंगलात के कई महत्वपूर्ण ठेके उनके परिवार को सौंप दिए. यहीं से इस परिवार की आर्थिक उन्नति का एक नया और स्वर्णिम अध्याय शुरू हुआ.
घने जंगलों के बीच बनी ‘बियावान की कोठी’
इस अभूतपूर्व तरक्की के बाद परिवार ने तत्कालीन शहर से दूर एक विशाल कोठी का निर्माण कराया. उस समय यह पूरा इलाका घने जंगल और लंबी-लंबी घास से घिरा हुआ था. लोककथाओं और पुरानी चर्चाओं में कहा जाता है कि यहां इतनी ऊंची घास होती थी कि उसमें हाथी तक छिप सकता था. स्थानीय भाषा में ऐसे सुनसान और घने जंगल वाले क्षेत्र को ‘बियावान’ कहा जाता था. इसी कारण इस भव्य भवन का नाम हमेशा के लिए ‘बियावान की कोठी’ पड़ गया.
चीनी मिलों से लेकर विदेशों तक फैला व्यापारिक साम्राज्य
समय के साथ इस दूरदर्शी परिवार ने व्यापार जगत में भी अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई. नेकपुर शुगर मिल से शुरुआत करते हुए उन्होंने धामपुर सहित कई अन्य बड़ी चीनी मिलों की स्थापना की. बाद में उनका यह व्यापार देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों तक भी पहुंचा. इसके अलावा, टावर निर्माण और औद्योगिक क्षेत्र में भी इस परिवार ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की. आज भी इस गौरवशाली परिवार की नई पीढ़ी देश के प्रतिष्ठित औद्योगिक संस्थानों से जुड़ी हुई है और उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही है.
About the Author
राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें