UP 2027: का कहत बा यूपी? — PART 2
UP Chunav 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है. लेकिन उसकी जमीन अभी से तैयार हो रही है. भाजपा अपने पुराने सामाजिक तालमेल (सोशल इंजीनियरिंग) को बचाए रखना चाहती है. समाजवादी पार्टी ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है. बसपा अभी मैदान में तो है, लेकिन उतनी मजबूत नहीं दिख रही. वह अपने बचे हुए असर को संभालने की कोशिश में है. कांग्रेस अपने लिए नया रास्ता तलाश रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2027 तक किस पार्टी का वोट बैंक बचेगा, किसमें सेंध लगेगी और किसकी राजनीति सिर्फ शोर बनकर रह जाएगी.
यह सीरीज ‘UP 2027: का कहत बा यूपी?’ का दूसरा भाग है. पहले भाग में हमने 2017 से 2022 के बीच यूपी की राजनीति में आए बड़े बदलावों की तस्वीर देखी थी. इस भाग में फोकस सीधा वोट पर है. वह भी जाति, सामाजिक समूह और पिछले चार बड़े चुनावों के आधार पर. यानी 2017 विधानसभा, 2022 विधानसभा, 2019 लोकसभा और 2024 लोकसभा. हम इन चार चुनावों के जरिए यह समझने की कोशिश करेंगे कि यूपी की राजनीति में जाति ने किस तरह बदला और 2027 के लिए उससे क्या संकेत निकलते हैं.
इससे पहले हम अपनी बात कहें एक बात पहले ही साफ कर लें. नीचे सीट और वोट शेयर के आंकड़े चुनावी नतीजों पर आधारित हैं. लेकिन जातिवार वोट का बड़ा हिस्सा अधिकतर CSDS-Lokniti जैसे post-poll surveys और सार्वजनिक चुनावी विश्लेषणों पर आधारित अनुमान है. यानी यह चुनाव आयोग का आधिकारिक “जाति अनुसार वोट” डेटा नहीं है, बल्कि सर्वे के आधार पर बनी तस्वीर है. इसलिए इसे बस रुझान की तरह पढ़ना चाहिए, अंतिम सरकारी सच की तरह नहीं हम सबको समझना है. तो बिना देरी किए समझते हैं पूरी बात.
2017 से 2024 तक यूपी की राजनीति की सबसे बड़ी कहानी क्या है?
अगर इन चार चुनावों को एक साथ रखकर देखें तो एक सीधी तस्वीर बनती है.
- 2017 विधानसभा में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की और यूपी की राजनीति का ढांचा बदल दिया.
- 2019 लोकसभा में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद बीजेपी ने अपना दबदबा बनाए रखा.
- 2022 विधानसभा में बीजेपी सत्ता में लौटी, लेकिन सपा ने वोट और सीट दोनों बढ़ाए.
- 2024 लोकसभा में बीजेपी को झटका लगा, सपा सबसे बड़ी फायदेमंद पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस भी साथ में फायदा ले गई.
यानी कहानी सिर्फ सीटों की नहीं है. असली कहानी यह है कि सवर्ण, गैर-यादव OBC, दलित, मुस्लिम और लाभार्थी वोट यानी सरकारी योजनाओं के फायदे पाने वाले लोग. किस तरह इधर-उधर हुए और किस पार्टी ने किस सामाजिक समूह में अपनी पकड़ मजबूत या कमजोर की.
पहले चार चुनावों का बड़ा डेटा देख लीजिए
- 2017 यूपी विधानसभा चुनाव
- BJP: 312 सीट, करीब 39.7% वोट
- SP: 47 सीट, करीब 21.8% वोट
- BSP: 19 सीट, करीब 22.2% वोट
- Congress: 7 सीट, करीब 6.3% वोट
2022 यूपी विधानसभा चुनाव
- BJP: 255 सीट, करीब 41.3% वोट
- SP: 111 सीट, करीब 32.1% वोट
- BSP: 1 सीट, करीब 12.9% वोट
- Congress: 2 सीट, करीब 2.3% वोट
- NDA कुल: 273 सीट
- SP गठबंधन: 125 सीट
2019 लोकसभा चुनाव (UP)
BJP: 62 सीट, करीब 49.6% वोट
BSP: 10 सीट, करीब 19.3% वोट
SP: 5 सीट, करीब 18.0% वोट
Congress: 1 सीट, करीब 6.3% वोट
NDA कुल: 64 सीट
2024 लोकसभा चुनाव (UP)
SP: 37 सीट, करीब 33.6% वोट
BJP: 33 सीट, करीब 41.4% वोट
Congress: 6 सीट, करीब 9.5% वोट
RLD: 2 सीट
Apna Dal (S): 1 सीट
Azad Samaj Party: 1 सीट
BSP: 0 सीट, करीब 9% के आसपास वोट
इन चार चुनावों को साथ रखकर देखें तो पहली बड़ी बात यह दिखती है कि बीजेपी का वोट 2017 से 2022 तक मजबूत बना रहा. 2019 में चरम पर गया, लेकिन 2024 में उसमें गिरावट आई. दूसरी तरफ सपा 2017 की कमजोरी से 2022 में उभरी और 2024 में सबसे मजबूत विपक्षी ताकत बनकर सामने आई. बसपा का ग्राफ लगातार नीचे गया.
2017 में बीजेपी ने क्या बदला?
2017 का चुनाव यूपी की राजनीति में बड़ा मोड़ था. बीजेपी ने सिर्फ चुनाव नहीं जीता, उसने सामाजिक जोड़ का नया मॉडल खड़ा किया. सवर्ण वोट उसके साथ मजबूती से खड़ा था ही, लेकिन उसने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समूहों में भी अपनी मजबूत जगह बनाई. यही वह चुनाव था, जहां समाजवादी पार्टी सत्ता में होने के बावजूद लड़खड़ा गई और बसपा भी अपना पुराना असर सीटों में नहीं बदल सकी. 2017 के बाद पहली बार यह साफ हुआ कि यूपी में सिर्फ पारंपरिक जातीय समीकरण से चुनाव नहीं जीता जाएगा. बीजेपी ने हिंदुत्व, मजबूत नेतृत्व, संगठन और सामाजिक विस्तार इन सबको एक साथ जोड़ दिया. यही उसकी आगे की जीतों की बुनियाद बनी.
2017 में किस सामाजिक समूह ने किसका साथ दिया?
2017 के लिए जातिवार वोट का आधिकारिक सरकारी डेटा नहीं है, लेकिन चुनावी विश्लेषणों और CSDS-Lokniti जैसे अध्ययनों में एक मोटी तस्वीर दिखती है. उस तस्वीर का सार यह है:
- सवर्ण वोट बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ गया.
- गैर-यादव OBC का बड़ा हिस्सा बीजेपी की तरफ झुका.
- यादव वोट समाजवादी पार्टी के साथ बना रहा.
- जाटव वोट का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ रहा.
- मुस्लिम वोट मुख्य रूप से सपा और बसपा के बीच बंटा, लेकिन भाजपा से दूर रहा.
- गैर-जाटव दलितों में बीजेपी ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी.
यानी 2017 में बीजेपी की जीत सिर्फ “मोदी लहर” या “एंटी-इनकंबेंसी” की कहानी नहीं थी. वह एक नए सामाजिक गठजोड़ की कहानी भी थी.
2019 के चुनाव में सपा ने BSP के साथ गठबंधन किया.
2019 में सपा-बसपा साथ आए, फिर भी बीजेपी कैसे जीत गई?
2019 का लोकसभा चुनाव यूपी की राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय है. सपा और बसपा साथ आए. यह गठबंधन कागज पर बहुत मजबूत दिखता था, क्योंकि माना गया कि यादव, मुस्लिम और जाटव वोट एक साथ आ गए तो बीजेपी मुश्किल में पड़ जाएगी. लेकिन नतीजा वैसा नहीं हुआ. बीजेपी ने 62 सीटें जीत लीं, NDA 64 पर पहुंच गया, जबकि सपा-बसपा गठबंधन अपेक्षा से कम असर दिखा सका. इसकी वजह सिर्फ सीटों की गणित नहीं थी. कई विश्लेषणों में यह सामने आया कि बीजेपी ने सवर्ण, गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित वोट में अपनी पकड़ बनाए रखी. इतना ही नहीं, कुछ जगहों पर गठबंधन का वोट ट्रांसफर भी पूरी तरह नहीं हुआ. यही वजह रही कि गठबंधन की राजनीतिक ताकत सीटों में वैसी नहीं बदल सकी, जैसी उम्मीद थी.
2019 में जातिवार वोट की तस्वीर क्या कहती है?
2019 के लिए CSDS के पोस्ट-पोल विश्लेषणों और सार्वजनिक चर्चाओं में जो रुझान सामने आए, उनका सार broadly यह रहा:
- सवर्ण वोट भारी संख्या में बीजेपी के साथ रहा.
- गैर-यादव OBC का बहुत बड़ा हिस्सा बीजेपी की तरफ रहा.
- यादव वोट का बड़ा हिस्सा सपा-बसपा गठबंधन के साथ गया.
- जाटव वोट बड़ी मात्रा में बसपा-गठबंधन के साथ गया.
- मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा गठबंधन की तरफ गया.
- गैर-जाटव दलित समूहों में बीजेपी को अच्छी बढ़त मिली.
यानी 2019 में जातीय ध्रुवीकरण साफ दिखा. लेकिन बीजेपी की खास बात यह रही कि उसने अपना कोर वोट बचाए रखा और गैर-यादव OBC + गैर-जाटव दलित + सवर्ण का जो घेरा बनाया था, उसे टूटने नहीं दिया.
2022 में सपा क्यों उभरी, लेकिन सरकार क्यों नहीं बदल सकी?
2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपनी वापसी की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रही. उसकी सीटें 47 से बढ़कर 111 हो गईं. वोट शेयर भी 21.8% से बढ़कर 32% के आसपास पहुंच गया. यह छोटी बात नहीं थी. लेकिन सरकार फिर भी बीजेपी की बनी. आखिर क्यों? इसका जवाब वोट के फैलाव में छिपा है. सपा ने यादव-मुस्लिम आधार को संभाला, कुछ नए सामाजिक समूहों में भी जगह बनाई, लेकिन बीजेपी का बड़ा सामाजिक गठजोड़ नहीं टूटा. बीजेपी ने सवर्ण + गैर-यादव OBC + लाभार्थी वर्ग + गैर-जाटव दलित के सहारे अपनी बढ़त बचाए रखी. यही 2022 का सबसे बड़ा निष्कर्ष था और बीजेपी को सत्ता में फिर ला दिया.
2022 में किस जाति ने किस तरफ झुकाव दिखाया?
2022 के लिए CSDS-Lokniti की उत्तर प्रदेश पोस्ट-पोल स्टडी एक महत्वपूर्ण संकेत देती है. इस सर्वे में जाति-समूह के हिसाब से वोट रुझानों की तस्वीर यह बताती है कि सवर्ण वोट का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ रहा. यादव वोट मुख्य रूप से सपा के साथ रहा. मुस्लिम वोट बहुत बड़ी मात्रा में सपा की तरफ गया. गैर-यादव OBC का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ रहा, लेकिन सपा ने कुछ हिस्सों में सेंध लगाई. जाटव वोट का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ बना रहा, हालांकि उसका असर सीटों में नहीं दिखा. गैर-जाटव दलितों में बीजेपी को बढ़त मिलती रही. यही वजह है कि 2022 में सपा मजबूत दिखी, लेकिन भाजपा को हटाने लायक सामाजिक जोड़ नहीं बना सकी.
2024 लोकसभा में तस्वीर क्यों बदल गई?
2024 लोकसभा चुनाव यूपी की राजनीति में एक बड़ा झटका लेकर आया. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी तो रही, लेकिन 62 से 33 सीटों पर आ गई. दूसरी तरफ सपा 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. कांग्रेस भी 6 सीटों तक पहुंची. बसपा शून्य पर चली गई.
यह सिर्फ सीटों की कहानी नहीं थी. 2024 ने यह संकेत दिया कि बीजेपी का सामाजिक गठजोड़ पहली बार इतनी मजबूती से चुनौती में आया. विपक्ष ने खासकर OBC, दलित, युवा, बेरोजगारी, संविधान, आरक्षण और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दों को जोड़ा. सपा-कांग्रेस गठबंधन को इसका फायदा मिला.
2024 में किस जाति ने किस तरफ रुख किया?
2024 के लिए भी जातिवार वोट का आधिकारिक सरकारी डेटा नहीं है, लेकिन CSDS-Lokniti और सार्वजनिक पोस्ट-पोल चर्चाओं का सार यह बताता है कि यादव वोट बड़े पैमाने पर सपा के साथ रहा. मुस्लिम वोट भारी संख्या में सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ गया. गैर-यादव OBC में बीजेपी की पकड़ बनी रही, लेकिन उसमें पहले जैसी एकतरफा मजबूती नहीं दिखी. कुछ दलित समूहों में भी बीजेपी को चुनौती मिली. सवर्ण वोट अब भी बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ रहा, लेकिन उसमें भी पहले जैसी पूर्ण एकजुटता की चर्चा कम हुई. बसपा का परंपरागत वोट बिखरा और उसका सबसे ज्यादा फायदा सपा-कांग्रेस को मिला. यानी 2024 का सबसे बड़ा संदेश यह था कि बीजेपी का किला अजेय नहीं है, लेकिन विपक्ष को जीतने के लिए सिर्फ मुस्लिम-यादव वोट नहीं, उससे बड़ा सामाजिक जोड़ बनाना होगा.
बीजेपी की असली ताकत आखिर है क्या?
यानी अगर 2017, 2019, 2022 और 2024 चारों चुनावों को जोड़कर देखें, तो बीजेपी की असली ताकत तीन चीजों में दिखती है.
1) सवर्ण वोट पर मजबूत पकड़
ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और दूसरे सवर्ण समूहों में बीजेपी की पकड़ लगातार मजबूत रही है. यही उसका सबसे स्थायी कोर है.
2) गैर-यादव OBC में लंबी पैठ
कुर्मी, लोध, निषाद, मौर्य, शाक्य, कुशवाहा, राजभर जैसे समूहों में बीजेपी ने पिछले दशक में लगातार काम किया. हर जगह बराबर मजबूती नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि उसने सपा के लिए रास्ता कठिन बनाया.
3) गैर-जाटव दलित + लाभार्थी राजनीति(सरकारी फायदा पाने वाले लोग)
मुफ्त राशन, उज्ज्वला, आवास, शौचालय, किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने बीजेपी को एक ऐसा वोट दिया, जो सिर्फ जाति से तय नहीं होता. गैर-जाटव दलितों में भी बीजेपी ने इसी दौर में पैठ बनाई.
सपा की ताकत और कमजोरी क्या है?
सपा की सबसे बड़ी ताकत उसका यादव-मुस्लिम आधार है. यह आधार 2017 के बाद भी बना रहा, 2022 में मजबूत हुआ और 2024 में और प्रभावी दिखा. लेकिन सपा की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है क्या वह इससे आगे जा सकती है? अखिलेश यादव की PDA लाइन पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक. असल में इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है. अगर सपा गैर-यादव OBC और दलित वोट में टिकाऊ सेंध लगा पाती है तो 2027 में मुकाबला बहुत जबर हो सकता है. अगर नहीं, तो उसका आधार बढ़ेगा जरूर, लेकिन सरकार बना पाएगी यह कहना मुश्किल है.
बसपा का क्या बचा है?
बसपा की सबसे बड़ी ताकत कभी जाटव वोट और दलित अस्मिता की राजनीति थी. 2017 में भी उसका वोट शेयर 22% से ऊपर था, लेकिन सीटें 19 ही आईं. 2022 तक उसका वोट शेयर लगभग 13% पर आ गया और सीट सिर्फ 1 बची. 2024 लोकसभा में वह शून्य सीट पर चली गई.
फिर भी बसपा को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी ही होगी. दलित राजनीति में मायावती का असर पूरी तरह गायब नहीं हुआ है. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या वह उस असर को फिर से चुनावी ताकत में बदल पाएंगी?
कांग्रेस की भूमिका क्या है?
यूपी में कांग्रेस अभी मुख्य लड़ाई की पार्टी नहीं है. लेकिन 2024 ने यह दिखाया कि अगर उसे सही गठबंधन, सही सीटें और सही सामाजिक संदेश मिल जाए, तो वह विपक्षी वोट को जोड़ने में भूमिका निभा सकती है. कांग्रेस का असर खासकर वहां महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां मुकाबला करीबी हो और भाजपा के खिलाफ विपक्ष को वोट जोड़ना हो.
यानी अब 2027 के लिए जाति राजनीति को लेकर क्या समझा जाए?
अगर इन चार चुनावों का सार निकालें तो तस्वीर कुछ इस तरह बनती है:
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत: सवर्ण + गैर-यादव OBC + गैर-जाटव दलित + लाभार्थी वोट
सपा की सबसे बड़ी ताकत: यादव + मुस्लिम + PDA के जरिए नए समूहों तक पहुंचने की कोशिश
बसपा की बची हुई ताकत: जाटव वोट और दलित प्रतीक की राजनीति
कांग्रेस की भूमिका: विपक्षी गठजोड़ में पूरक ताकत
लेकिन 2027 की लड़ाई में सिर्फ पुराना गणित काम नहीं करेगा. इनमें तीन चीजें सबसे अहम होंगी:
1) गैर-यादव OBC किस तरफ जाते हैं
यूपी की राजनीति का सबसे बड़ा battlefield यही है. बीजेपी की सबसे बड़ी बढ़त भी यहीं है और विपक्ष की सबसे बड़ी उम्मीद भी.
2) दलित वोट किस हद तक बंटता है
अगर दलित वोट बसपा, भाजपा और सपा के बीच बंटा रहा, तो बीजेपी को फायदा हो सकता है. अगर सपा या कोई बड़ा विपक्षी फ्रेम इसमें बड़ी सेंध लगा पाया, तो तस्वीर बदल सकती है.
3) युवा, बेरोजगारी और स्थानीय नाराजगी कितना असर डालती है
2024 ने यह दिखा दिया कि सिर्फ जाति ही सब कुछ नहीं है. भर्ती, पेपर लीक, बेरोजगारी, संविधान, आरक्षण और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दे भी वोट की दिशा बदल सकते हैं.
जाति के साथ भरोसा ही 2027 में दिलाएगा जीत?
उत्तर प्रदेश में 2027 की लड़ाई सिर्फ नेताओं के चेहरों की नहीं होगी. यह लड़ाई सामाजिक गठजोड़, जातीय संतुलन, वोट ट्रांसफर, स्थानीय असंतोष, लाभ पाने की राजनीति और विपक्ष की विश्वसनीयता इन सबकी परीक्षा है. अभी की तस्वीर में बीजेपी सबसे मजबूत दल दिखती है, लेकिन 2024 ने यह बता दिया कि उसकी जमीन अटूट नहीं है. सपा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है, लेकिन उसे अपने कोर वोटर से बाहर निकलना होगा. बसपा कमजोर है, लेकिन उसका असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. कांग्रेस छोटी है, लेकिन समीकरणों में उसकी जगह बन सकती है. यानी 2027 का रास्ता अभी से बन रहा है. और इस रास्ते की सबसे अहम कहानी यही है किस जाति का वोट किस तरफ गया, किसका आधार बचा और किसकी जमीन खिसकी.
अगले भाग में पढ़िए:
UP 2027: बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत क्या है, और सबसे बड़ा खतरा कहां से है?