लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में ब्राह्मण अचानक से राजनीति के केंद्र में आ गए हैं. यूं तो पूरे उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की कुल आबादी 14 फीसदी मानी जाती है, जिसमें त्यागी और भूमिहारों को भी जोड़ा जाता है. 1990 में यूपी की राजनीति से कांग्रेस के उजड़ने के बाद से ब्राह्मण राजनीतिक रूप से हाशिये पर चले गए हैं. 2007-2012 के बीच ब्राह्मणों को राजनीतिक ताकत मिली, लेकिन उसके बाद से एक बार फिर से यह जाति राजनीति के फ्रंट पर कम ही मौकों पर दिखता रहा है. अब 2027 के रण से पहले समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने ब्राह्मणों को अचानक से यूपी की राजनीति के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है.
सवाल उठ रहे हैं इस वक्त देश के लगभग सभी राज्यों की राजनीति में ब्राह्मण समाज हाशिये पर जा चुका है, तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में इस समाज की चुनाव से पहले इतनी चर्चा क्यों है. आइए पहले जानते हैं कि सपा-बसपा ने कैसे ब्राह्मणों को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
मायावती की तरफ से ब्राह्मणों को सम्मान देने का ऑफर
साल 2007 में दलित और ब्राह्मण गठजोड़ का सोशल इंजीनियरिंग बनाने वाली बीएसपी प्रमुख मायावती ने 2027 में भी ऐसा ही प्रयोग करने की ओर कदम बढ़ाई हैं. मायावती ने पहली बार लिखित तौर पर स्वीकार किया है कि 2007 में ब्राह्मणों की वजह से उन्हें पांच साल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी. बीएसपी सुप्रीमो ने उसी दौर की याद दिलाते हुए अपने ऑफिशियल एक्स अकाउंट पर लिखा- ‘बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों को देखते हुए जब से अपरकास्ट समाज और उसमें से खासकर ब्राह्मण समाज को, उनके बीएसपी में जुड़ने को ध्यान में रखकर, पार्टी का उम्मीदवार बनाना शुरू कर दिया है, तब से सभी विरोधी पार्टियों में व खासकर समाजवादी पार्टी में उनकी नींद उड़ा देने वाली बेचैनी देखने को मिल रही है, जो कि सन् 2007 की तरह ब्राह्मण समाज के योगदान से बीएसपी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जैसा ही इस बार के आगामी चुनाव परिणाम के रिपीट होने की संभावना के तहत स्वाभाविक ही प्रतीत होता है.
वैसे भी यह सर्वविदित है कि यूपी जैसे विशाल आबादी वाले प्रदेश में अपरकास्ट में से खासकर ब्राह्मण समाज का हित बीएसपी में ही सुरक्षित है, जिस अपनी इस सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय के सिद्धान्त, नीयत व नीति को बहुजन समाज पार्टी ने पहले पार्टी स्तर पर अमल करके और फिर सरकार बनने पर भी उन्हें भरपूर आदर-सम्मान के साथ-साथ उन्हें हर स्तर पर पूरी-पूरी भागीदारी देकर यह साबित भी कर दिया है, जबकि दूसरी पार्टियों की सरकारों में इस वर्ग के लोग पिछले काफी समय से अपने आपको काफी उपेक्षित, असुरक्षित व ठगा हुआ भी महसूस कर रहे हैं.’
मायावती ने आगे लिखा- ‘इतना ही नहीं बल्कि ब्राह्मण समाज द्वारा सामाजिक भाईचारा के आधार पर बीएसपी से जुड़ने की इनकी तैयारियों को ध्यान में रखकर इन्हें पार्टी उम्मीदवार बनाने की प्रक्रिया जारी है तथा इन्हें बीएसपी की आयरन लेडी नेतृत्व पर पूरा यह यकीन भी है कि बीएसपी की सरकार बनने पर उन्हें पहले की तरह ही हर स्तर पर भरपूर आदर-सम्मान जरूर दिया जायेगा, जो कि इनकी वास्तविक चिन्ता व दूसरी पार्टियों से मुंह मोड़ने का कारण है. इसके साथ ही, अपरकास्ट में से क्षत्रिय, वैश्य आदि व अन्य समाज के लोगों को भी उनकी बीएसपी से जुड़ने की तैयारी अर्थात जिसकी जितनी तैयारी उसकी उतनी भागीदारी के आधार पर चुनाव में उम्मीदवार भी जरूर बनाया जायेगा, जिसकी तैयारी हर स्तर पर लगातार जारी है.
बीएसपी, दूसरी पार्टियों की तरह कुछ लोगों को लॉलीपाप थमाने की संकीर्ण व स्वार्थ की राजनीति नहीं करती है बल्कि पूरे समाज के हित व कल्याण की चिन्ता करना अपना संवैधानिक कर्तव्य समझती है और इसलिए बीएसपी की नीति व कार्यक्रम जनहित व जनकल्याण तथा अपराध नियंत्रण व कानून व्यवस्था के मामले में भी देश व जनहित में बेहतरीन होते हैं.’
मायावती ने 2007 में सतीश चंद्र मिश्रा को आगे कर ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ा था.
अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को रिझाना शुरू किया
इससे पहले समाजवादी पार्टी ने भी लखनऊ स्थित अपने कार्यालय में ब्राह्मण नेताओं का जुटान कराया. इस बैठक की अध्यक्षता खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने की. यहां जय परशुराम और जय जनेश्वर मिश्र के नारे लगे. इसके अलावा तय हुआ कि समाजवादी पार्टी अपनी पार्टी के संस्थापक नेताओं में एक रहे जनेश्वर मिश्र की जयंती 5 अगस्त को विशाल ब्राह्मण सम्मेलन करेंगे. यह आयोजन सपा सरकार में लखनऊ में बने 300 एकड़ में फैले जनेश्वर पार्क में आयोजित किया जाएगा.
बीजेपी से ब्राह्मणों की नाराजगी के चलते सपा-बसपा को जगी उम्मीद
दरअसल, उत्तर प्रदेश में पिछले साढ़े नौ साल से चल रही योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार में ब्राह्मण खुद को हाशिये पर समझ रहा है. 23 दिसंबर 2025 को बीजेपी के 46 में से 43 ब्राह्मण विधायकों ने लखनऊ में एक चाय पार्टी की थी. इस चाय पार्टी में बीजेपी की तरफ से केवल डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, पूर्व डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और बरहज के विधायक दीपक कुमार मिश्र उर्फ शाका बाबा नहीं पहुंचे थे. बाकी बीजेपी के 43 विधायक इकट्ठा होकर नाराजगी जाहिर की. उनका साफ तौर से मानना है कि बीजेपी के पदाधिकारी, कार्यकर्ता, संगठन से लेकर सरकार के विधायक, मंत्री ये सारे लोग आरोप लगाते हैं कि मौजूदा सरकार में ठाकुरवाद है. एकत्र हुए 43 विधायकों की नाराजगी थी कि इस सरकार में उनकी कोई नहीं सुनता है. हमारे कोई काम नहीं होते हैं. तभी ओबीसी (कुर्मी) समाज से आने वाले पंकज चौधरी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने और उन्होंने बैठक करने वाले तमाम ब्राह्मण विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. जबकि इससे पहले बीजेपी में कुर्मी, ठाकुर, लोध, धोबी जैसी जातियों के नेता इस तरह का जुटान कर चुके थे. लेकिन पार्टी की तरफ से डांट केवल ब्राह्मणों को मिली.
मौजूदा समय में समाजवादी पार्टी में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरा हैं.
इसके अलावा ब्राह्मणों का मानना है कि योगी सरकार में ब्राह्मणों को लीडिंग रोल में नहीं रखा गया है. सरकार में ब्राह्मणों के दो बड़े चेहरे उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और मंत्री मनोज पांडेय को समाज समाजवादी पार्टी से आयातित मानता है. ब्राह्मण समाज मानता है कि सरकार में सुरेश कुमार खन्ना, प्रतिभा शुक्ला, योगेंद्र उपाध्याय, सुनील कुमार शर्मा, नितिन अग्रवाल, दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ जैसे भी ब्राह्मण चेहरे हैं, लेकिन बड़े निर्णय लेने में इनका कोई रोल नहीं होता है. साथ ही ब्राह्मण समाज का यह भी आरोप है कि यूपी की टॉप नौकरशाही में भी ब्राह्मण उपेक्षित है.
यूपी में ब्राह्मण समाज को लेकर कहा जाता है कि यह बीजेपी का स्वघोषित वोटर हैं. इन तमाम घटनाओं को देखते हुए ब्राह्मणों के कुछ नेता यह भी कहने लगे हैं कि उन्हें बीजेपी हल्के में मानकर चल रही है. इसी मौके का फायदा उठाकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मणों पर डोरे डालने का प्रयास किया है.
सपा-बसपा ने ब्राह्मणों को क्या दिया?
डोरे डालने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के इतिहास को देखें तो दोनों ने समय-समय पर ब्राह्मण समाज के लिए कुछ ना कुछ किया ही है. समाजवादी पार्टी दावा करती है कि ब्राह्मण समाज से आने वाले जनेश्वर मिश्र सपा के संस्थापक सदस्य रहे हैं. सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव उनका काफी सम्मान करते थे और उन्हें छोटे लोहिया कहकर संबोधित करते थे. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि समाजवादी जनेश्वर मिश्र जातिवाद और परिवारवाद के घोर विरोधी रहे. इसके अलावा सपा कहती है कि ब्राह्मण समाज से आने वाले वरिष्ठ नेता माता प्रसाद को पहले विधानसभा स्पीकर और अब नेता प्रतिपक्ष बनाया है. इसके अलावा परशुराम जयंती पर सपा सरकार ने सरकारी छुट्टी घोषित की जिसे योगी सरकार ने समाप्त कर दिया.
वहीं बीएसपी प्रमुख मायावती दावा करती हैं कि 2007 में ब्राह्मणों के सपोर्ट के चलते सरकार बनने के बाद उन्होंने इस समाज को काफी सम्मान दिया. वह कह रही हैं कि इस बार ज्यादा से ज्यादा ब्राह्मणों को टिकट देंगी, जिसकी वह शुरुआत कर चुकी हैं. बीएसपी दावा करती है कि 2007-2012 के कार्यकाल में सरकार और प्रशासन में हर स्तर पर ब्राह्मणों को पूरा सम्मान दिया गया था. ब्राह्मण समाज के तमाम नेता अहम मंत्रालय संभाल रहे थे. यहां तक की थानों में दारोगा की बहाली तक में ब्राह्मणों को पर्याप्त स्थान दिया गया था. इसी दौरान बीएसपी ने नारा दिया था ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा हाथी चलता जाएगा.’
यूपी की राजनीति में ब्राह्मण इतने जरूरी क्यों?
वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी कहते हैं कि ब्राह्मणों की भले ही 14 फीसदी आबादी है, लेकिन इसका प्रभाव हमेशा दिखता है. उन्होंने कहा कि यूपी की राजनीति में ब्राह्मण समाज माहौल बनाता है. चुनावों में ब्राह्मण किसी भी पार्टी के लिए नैरिटव गढ़ सकता है और बिगाड़ने में भी सक्षम है. उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में बीजेपी ने ब्राह्मणों को फॉर ग्रांटेड ले लिया है. ऐसे में ब्राह्मणों के पास एक सॉफ्ट विकल्प दिखता है कि यार अगर बहनजी (मायावती) होतीं तो हम बीजेपी को अपनी वोट की ताकत दिखाते. यूपी की राजनीति से लगभग गायब हो चुकीं मायावती ब्राह्मणों को इस तरह का ऑफर दे रही हैं और सम्मान देने की बात कर रही हैं. अगर ब्राह्मणों को मायावती की बात समझ में आ जाती है तो विधानसभा चुनाव में बड़ा खेल दिख सकता है.
उन्होंने कहा कि इस वक्त समाजवादी पार्टी हर उस वोटर को अपने साथ जोड़ने के प्रयास में है जो बीजेपी की सरकार से परेशान है. ऐसे में अगर ब्राह्मणों को उनके साथ लाने का प्रयास विफल होता है तो यह उनके लिए डायरेक्ट नुकसान होगा. वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि यह क्लियर बात है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता जाने के बाद से अगर ब्राह्मणों का सबसे ज्यादा सम्मान किसी ने किया है तो वह केवल मायावती हैं.