लखनऊ: कांग्रेस के नवनियुक्त उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सोमवार को एक नई चर्चा को हवा दे दी. राजेंद्र पाल गौतम ने आगामी यूपी चुनाव 2027 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन के प्रयास करने की बात कही. पत्रकारों ने कांग्रेस नेता से पूछा कि क्या बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन की कोई कोशिश की जा रही है? इसपर उन्होंने साफ तौर से कहा कि वह हर किसी से मिलेंगे. साथ ही कहा कि जिन्हें भी देश का संविधान बचाना है, उन्हें एक मंच पर आना चाहिए.
यहां याद करा दें कि पिछले महीने राजेंद्र पाल गौतम और तनुज पुनिया बिना किसी पूर्व सूचना के मायावती से मिलने उनके घर पहुंच गए थे. हालांकि मायावती इनसे नहीं मिलीं. उस दिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के दौरे पर ही थे. यह बात जब सुर्खियां बनीं तब कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम और तनुज पुनिया को नोटिस जारी कर पूछा था कि उन्होंने ये कदम क्यों उठाया था. अब राजेंद्र पाल गौतम को ही उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है.
उस दौरान कांग्रेस की ओर से पल्ला झाड़ने के बाद राजेंद्र पाल गौतम ने कहा था कि वह मायावती की सेहत का हालचाल जानने गए थे. लेकिन अब उन्होंने प्रदेश प्रभारी का पद संभालते ही मायावती को गठबंधन में लाने बात खुलकर कह दी है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि राजेंद्र पाल गौतम ने एक तरफ जहां मायावती के साथ गठबंधन के प्रयास की बात कही है, दूसरी तरफ उन्होंने समाजवादी पार्टी के मुकाबले कांग्रेस को बड़ा भाई बताते हुए सीट शेयरिंग में बराबरी का हक भी जताया है.
सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस के प्रयास से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक ही गठबंधन में आते हैं तो यूपी चुनाव 2027 में इसका क्या इंपैक्ट हो सकता है. यूपी में लंबे समय से एक दूसरे के खिलाफ बेहद आक्रामक राजनीति करते आ रहीं सपा और बसपा 2019 में सारे गिले शिकवे भुलाकर गठबंधन कर चुकी हैं. लेकिन बीजेपी के सामने जनता ने सपा-बसपा गठजोड़ को ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी.
बुआ-बबुआ की जोड़ी को नकार चुका है यूपी
2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य की सत्ता में रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी के केवल पांच सांसद जीत पाए थे. सभी पांचों सांसद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्य थे. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अखिलेश यादव से ना केवल सत्ता छीनी बल्कि समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के बावजूद बुरी शिकस्त मिली. वहीं बीएसपी भी 2014 में एक भी सांसद नहीं जीता पाई. ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के बीच गठबंधन हुआ.
इस चुनाव में बुआ और बबुआ की जोड़ी को काफी प्रचारित किया गया, लेकिन जब रिजल्ट आया तो यह गठबंधन पूरी तरह से फेल साबित हुआ. समाजवादी पार्टी एक बार फिर से पांच सांसद ही जीता पाई, वहीं बसपा शून्य से 10 के आंकड़े तक पहुंच गई. अखिलेश-मायावती के गठबंधन के बाद भी बीजेपी की अगुवाई में एनडीए के 64 सांसद जीते. चुनाव के बाद मायावती ने आरोप लगाया कि बसपा के वोट सपा को ट्रांसफर हो गए, लेकिन सपा के वोट बसपा को नहीं मिले, इसलिए वह इस गठबंधन को तोड़ रही हैं.
2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को 19.43%, सपा को 18.11% वोट मिले. वहीं बीजेपी को अकेले 49.98 यानी करीब 50 फीसदी वोट मिले. गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल भी शामिल थी, जिसे 1.69 फीसदी वोट मिले थे. इस चुनाव में कांग्रेस अकेले चुनाव में उतरी थी, जिसे केवल 6.36% वोट मिले थे. इस चुनाव में खुद राहुल गांधी अमेठी में बीजेपी की स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए थे. केवल सोनिया गांधी राय बरेली से कांग्रेस की एक मात्र सांसद जीत पाई थीं.
अब अगर 2019 के लिटमस टेस्ट में वोटों की ताकत का आंकलन करें तो सपा, बसपा और आरएलडी मिलकर भी 39.23 फीसदी वोट मिले थे, जो कि बीजेपी से 10 फीसदी कम है. अगर इसमें कांग्रेस का वोट भी जोड़ दें तो भी यह आंकड़ा 45.59 तक ही पहुंचता है, यानी बीजेपी भी फिर भी करीब साढ़े चार फीसदी वोटों से आगे थी.