“पुलिस स्टेशन किसी भी महिला के लिए सिर्फ एक सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि न्याय की पहली उम्मीद होता है। महिला वहाँ सिर्फ एफआईआर दर्ज कराने नहीं, अपना विश्वास लेकर आती है। आपकी वर्दी सिर्फ अथॉरिटी का प्रतीक नहीं है, बल्कि जनता के भरोसे का नाम है। आपके शब्द, व्यवहार और बात करने का तरीका ही किसी पीड़िता का खोया हुआ आत्मविश्वास लौटा सकता है।” यह बात राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहातकर ने गुरुवार को 12 बजे कानपुर में कही। वे राघवेंद्र स्वरूप सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स ऑडिटोरियम में आयोग द्वारा आयोजित ‘शक्ति और सुरक्षा: एडवांसिंग जेंडर सेंसिटिव पुलिसिंग’ विषय पर दो दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम के पहले दिन पुलिस अधिकारियों को संबोधित कर रही थीं। जेंडर सेंसिटिव पुलिसिंग से ही होगा देश का निर्माण महिला आयोग की अध्यक्ष ने पुलिस दल को और अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि महिला सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह सुशासन यानी गुड गवर्नेंस का सबसे बड़ा पैमाना है। जिस समाज में महिलाएँ सुरक्षित महसूस करती हैं, वहाँ शिक्षा, अर्थव्यवस्था, निवेश और विकास बहुत तेजी से आगे बढ़ता है। यही वजह है,कि जेंडर सेंसिटिव पुलिसिंग सीधे तौर पर राष्ट्र निर्माण का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने इस बात पर भी खुशी जताई कि उत्तर प्रदेश सरकार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और यहाँ का पुलिस प्रशासन महिलाओं को धरातल पर राहत देने के लिए पूरा सहयोग कर रहा है। जब गैंगरेप केस में पुलिस को लगानी पड़ी थी डांट संबोधन के दौरान अध्यक्ष ने एक शहर के पुराने मामले का उदाहरण देते हुए पुलिस की लापरवाही को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने बताया कि एक नाबालिग बच्ची के साथ गैंगरेप हुआ था, लेकिन पुलिस को चार दिन तक इसकी भनक ही नहीं लगी। जब पता चला, तब भी पुलिस अपनी कागजी कार्रवाई में इतनी व्यस्त रही कि कानूनी नियमों को ही भूल गई। कानून के मुताबिक पीड़ित नाबालिग बच्ची को तुरंत महिला बाल कल्याण समिति के सामने हाजिर करना पुलिस की पहली जिम्मेदारी थी, जिस पर ध्यान ही नहीं दिया गया। विजया रहातकर ने कहा कि इस चूक के बाद उन्हें खुद पुलिस अधिकारियों को कड़ी डांट लगानी पड़ी और नोटिस तक जारी करना पड़ा। उन्होंने नसीहत दी कि अगर हर केस में पुलिस खुद को सचेत रखे, तो ऐसी जरूरी चीजें कभी नहीं छूटेंगी। जनसुनवाई का किस्सा,प्रताड़ना अपनों से या पुलिस से?
उन्होंने जनसुनवाई के दौरान सामने आने वाले व्यावहारिक अनुभवों को भी साझा किया। कई बार महिलाएँ शिकायत लेकर आती हैं कि पुलिस उनकी बात नहीं सुनती, चार-चार घंटे थाने में बिठाकर रखती है या रोज बुलाने के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं करती। इस पर वे हंसी-मजाक में पीड़िता से पूछती हैं कि उनकी शिकायत प्रताड़ित करने वाले परिवार के खिलाफ है या पुलिस के खिलाफ? तब महिला कहती है,कि शिकायत तो अपनों के ही खिलाफ है, लेकिन पुलिस को मदद करनी चाहिए थी। अध्यक्ष ने अधिकारियों का पक्ष लेते हुए यह भी साफ किया कि वे पुलिस को दोष नहीं दे रही हैं। पारिवारिक और पति-पत्नी के विवादों में पुलिस को दोनों पक्षों को बिठाकर सुलह का समय जरूर लेना चाहिए, क्योंकि परिवार टूटना नहीं चाहिए। 17 जिलों के 200 पुलिस अफसरों को मिली ट्रेनिंग
इस विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम के पहले दिन कानपुर और आगरा जोन के साथ-साथ दोनों शहरों के पुलिस कमिश्नरेट के 17 जिलों से आए लगभग 200 पुलिस उपाधीक्षक, निरीक्षक और उपनिरीक्षक स्तर के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। कानपुर के पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल और महिला व बाल सुरक्षा संगठन के आईजी सुभाष चंद्र दुबे की मौजूदगी में चले तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने जेंडर सेंसिटाइजेशन, जीरो एफआईआर, पीड़ित प्रतिकर, घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दों पर प्रभावी कानूनी कार्रवाई का पाठ पढ़ाया। शुक्रवार को कार्यक्रम के दूसरे और आखिरी दिन साइबर अपराध, सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ अपराध और कार्यस्थल पर उत्पीड़न (POSH) जैसे गंभीर विषयों पर ट्रेनिंग दी जाएगी।
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वीमेन सेफ्टी ही गुड गवर्नेंस का पैमाना:महिला आयोग अध्यक्ष बोलीं- पुलिस थाना न्याय की पहली उम्मीद, वर्दी सिर्फ रौब नहीं बल्कि भरोसे का प्रतीक