- इस्लामी पहचान और सादगी बनाए रखने का आह्वान.
मशहूर देवबंदी उलेमा और जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने हज और उमराह से लौटने वाले लोगों के स्वागत में केक काटने की बढ़ती परंपरा पर चिंता जताई है. मक्का मुकर्रमा से जारी अपने एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में धीरे-धीरे ऐसी कई नई रस्में शामिल होती जा रही हैं, जिनका इस्लामी शिक्षाओं से कोई संबंध नहीं है.
मौलाना ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में हज और उमराह से लौटने वाले लोगों के स्वागत के तरीके बदल गए हैं. पहले लोग घर लौटने वाले हाजी का गले मिलकर स्वागत करते थे, उनके लिए दुआ करते थे और उनसे पवित्र स्थानों की यादें सुनते थे, लेकिन अब कई जगहों पर स्वागत के नाम पर केक काटने का चलन शुरू हो गया है. केक पर ‘हज मुबारक’ या ‘उमराह मुबारक’ लिखकर समारोह आयोजित किए जाते हैं.
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इस्लाम ने नहीं सिखाया यह तरीका
उन्होंने कहा कि मुसलमानों को यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह तरीका इस्लाम ने सिखाया है? उनके अनुसार हज और उमराह बहुत बड़ी इबादत है और इसकी खुशी मनाना अच्छी बात है, लेकिन खुशी मनाने का तरीका भी इस्लामी शिक्षाओं और सुन्नत के मुताबिक होना चाहिए. कारी इसहाक गोरा ने कहा कि पहले जन्मदिन पर केक काटने का चलन शुरू हुआ, फिर शादी-ब्याह और अन्य कार्यक्रमों में यह परंपरा पहुंची.
अब धार्मिक मौकों पर भी इसे अपनाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि बिना सोचे-समझे दूसरे समाजों की परंपराओं की नकल करना ठीक नहीं है. मुसलमानों को अपनी धार्मिक पहचान और संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहिए. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने सामाजिक और धार्मिक कामों का समय-समय पर जायजा लें और यह देखें कि उनके तौर-तरीके इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप हैं या नहीं.
मौलाना कारी ने कहा- इस्लामी मूल्यों, सादगी और सुन्नत को दें प्राथमिकता
गौरतलब है कि हज इस्लाम के पांच प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है. हर साल दुनिया भर से लाखों मुसलमान सऊदी अरब जाकर हज अदा करते हैं. वहीं, उमराह भी एक महत्वपूर्ण इबादत है, जिसे साल के किसी भी समय किया जा सकता है. हज और उमराह से लौटने वाले लोगों का सम्मान और स्वागत करना मुस्लिम समाज की पुरानी परंपरा रही है.
हालांकि, अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में स्वागत के तरीके अलग हो सकते हैं. हाल के वर्षों में सोशल मीडिया और आधुनिक आयोजनों के प्रभाव के कारण कई नए तौर-तरीके देखने को मिले हैं, जिन पर धार्मिक विद्वानों के बीच समय-समय पर चर्चा होती रही है.
मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि मुसलमानों को चाहिए कि वो अपनी खुशियों का इजहार जरूर करें, लेकिन ऐसा करते समय इस्लामी मूल्यों, सादगी और सुन्नत को प्राथमिकता दें. उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को सही धार्मिक समझ देना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.
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