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दिल्ली-एनसीआर के पास स्थित एक ऐसी ऐतिहासिक धरती, जो अपने सीने में महाभारत कालीन रहस्यों से लेकर देश की आजादी के क्रांतिकारियों तक का इतिहास समेटे हुए है. हम बात कर रहे हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से महज 45 किलोमीटर दूर स्थित हस्तिनापुर की. यहां पांडवों के महल के अवशेष (पांडव टीला) हैं, तो अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के मामा का गुप्त महल भी है. अगर आप भी इतिहास को करीब से जानने और देखने के शौकीन हैं, तो हस्तिनापुर के ये चमत्कारी और ऐतिहासिक स्थल आपको एक अलग ही रोमांच से भर देंगे.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से 45 किलोमीटर दूर हस्तिनापुर आज भी विभिन्न प्रकार के महाभारत कालीन और ऐतिहासिक तथ्यों को अपने अंदर समाए हुए है. जहां आपको भगवान श्री कृष्ण से लेकर पांचों पांडवों एवं देश को आजाद करने वाले विभिन्न क्रांतिकारियों के इतिहास से भी रूबरू होने का मौका मिलेगा.

जी हां, दरअसल जैसे ही आप हस्तिनापुर में प्रवेश करेंगे, तो आपको यहां पांडव टीला देखने को मिलेगा. यहीं पर पांडवों के महल हुआ करते थे. पांडव टीले की खासियत की अगर बात की जाए तो अब इसे काफी बेहतर तरीके से विकसित कर दिया गया है. जिस तरह से पहाड़ों पर जाकर आप विभिन्न प्रकार की सेल्फी लेकर अपनी यात्रा को बेहतर तरीके से संजो सकते हैं, उसी तरह का उदाहरण यहां भी देखने को मिलता है. यहां पेड़ों को विभिन्न प्रकार के सेल्फी आकार में ढाला गया है.

उल्टा खेड़ा टीला के पास ही आपको प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के मामा राजा रघुनाथ नायक मराठे का महल भी देखने को मिलेगा. जहां वह क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ विभिन्न प्रकार की रणनीतियां बनाते थे. इस दौरान वह लंबे समय तक हस्तिनापुर में ही अपने साथियों के साथ रहे थे. महल के पास ही साधना स्थल भी है, साथ ही दो गुप्त गुफाएं भी हैं; जिसमें एक साथ बैठकर 50 लोग रणनीति तैयार करते थे.
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18वीं शताब्दी में हस्तिनापुर से संबंधित क्षेत्र में राजा नैन सिंह का बहसुमा गांव में आज भी दीवान-ए-खास मौजूद है, जो अपनी पुरानी संस्कृति, सभ्यता और वास्तुकला के अद्भुत संगम के लिए जाना जाता है. इतिहासकार एवं महाभारत कालीन हस्तिनापुर एक्सपर्ट प्रियंक भारती बताते हैं कि राजा नैन सिंह इसी दीवान-ए-खास में बैठकर जनता को न्याय देते थे.

हस्तिनापुर से संबंधित फिरोजपुर गांव में सिद्धपीठ शिव मंदिर भी मौजूद है, जिसका इतिहास पांडवों से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि इस मंदिर में आज तक छत नहीं डल पाई है. साथ ही यहां कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु भोले बाबा का जलाभिषेक करते हुए दिखाई देते हैं, क्योंकि यहां जो भी श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

पांडव टीले के पास ही पांडेश्वर मंदिर भी देखने को मिलेगा, जो हजारों वर्ष पुराना बताया जाता है. किंवदंती है कि पांचों पांडव यहीं पर ही विधि-विधान के साथ बूढ़ी गंगा में स्नान करने के पश्चात भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना किया करते थे. मान्यता यह है कि यहां पर जो भी श्रद्धालु विधि-विधान के साथ आज भी भोले बाबा की पूजा-अर्चना करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

हस्तिनापुर में ही आपको द्रौपदी मंदिर भी देखने को मिलेगा, जो कहीं न कहीं महाभारत कालीन यादों को जीवित करता है; क्योंकि इसमें जो मूर्ति लगी हुई है, वह चीरहरण की दास्तान को दर्शाती है. हालांकि, अब यहां पर आसपास शिलापट भी लगाए जा रहे हैं, जिससे कि युवा पीढ़ी महाभारत कालीन इतिहास के साथ-साथ द्रौपदी मंदिर के इतिहास से भी परिचित हो सके.

बताते चलें कि हस्तिनापुर की धरती विभिन्न प्रकार के रहस्यों को अपने अंदर समेटे हुए है. इसलिए यहां पर लगातार पुरातत्व विभाग द्वारा भी समय-समय पर हस्तिनापुर से संबंधित क्षेत्रों में खुदाई की जाती है. इसमें यदि पांडव टीले की बात करें, तो यहां विभिन्न खुदाइयों में अलग-अलग प्रकार की सभ्यताओं से जुड़े हुए मिट्टी एवं टेराकोटा के बर्तन भी मिले हैं. ऐसे में अगर आप भी घूमने जा रहे हैं, तो इन सभी ऐतिहासिक स्थलों पर अवश्य जाएं, जिससे कि आप हजारों साल पुरानी परंपराओं का वास्तविक इतिहास जान पाएं.