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आगरा का आखिरी गांव जहां पहले कभी खेती करना मुश्किल था. वर्तमान में वहां बड़े पैमाने पर उच्च क्वालिटी का आलू किया जा रहा है. जो आस पास के क्षेत्रों में काफी पसंद किया जाता है. बात रही है आगरा से करीब 55 किलोमीटर दूर गांव सांधन की, यह गांव आगरा का आखिरी गांव है. इसके पश्चिमी दिशा की ओर मथुरा की सीमा शुरू हो जाती है और दूसरी पूर्व की तरफ राजस्थान के भरतपुर की सीमा लगतती है.
आगरा: आगरा का आखिरी गांव जहां पहले कभी खेती करना मुश्किल था. वर्तमान में वहां बड़े पैमाने पर उच्च क्वालिटी का आलू किया जा रहा है. जो आस पास के क्षेत्रों में काफी पसंद किया जाता है. बात रही है आगरा से करीब 55 किलोमीटर दूर गांव सांधन की, यह गांव आगरा का आखिरी गांव है. इसके पश्चिमी दिशा की ओर मथुरा की सीमा शुरू हो जाती है और दूसरी पूर्व की तरफ राजस्थान के भरतपुर की सीमा लगतती है.
इस गांव में वाटर लेवल काफी ऊपर होने के कारण थोड़ी से खुदाई मात्र से जमीन में से पानी ऊपर आने लगता था. स्थिति यह थी कि किसान यहाँ खेती तक नहीं कर पाते थे. वर्तमान में स्थिति कुछ सालों से समान्य हुई है और अब यहाँ के ग्रामीण आलू की खेती बड़े स्तर पर करते है. हैरानी की बात यह है कि कभी बंजर रही यह भूमि आज अपने उच्च क्वालिटी के आलू के लिए मशहूर है. यहाँ का आलू आस पास के क्षेत्रों में चर्चा का विषय रहता है.
पहले खेती करना था मुश्किल
आगरा के आखिरी गांव सांधन के ग्रामीण हरीश ठाकुर ने बताया कि उनके यहां बड़े स्तर पर आलू की खेती होती है. उन्होंने कहा कि उनके गांव में जलस्तर काफी ऊंचा है. पहले कभी यहां खेती संभव नहीं थी लेकिन जैसे जैसे समय बदल रहा है तो आने वाले समय के साथ कई व्यवस्थाएं बदली है जिस कारण अब खेती की जा रही है. कुछ हिस्सों में तो आज भी जलस्तर इतना ऊपर है कि उस क्षेत्र में खेती करना मुमकिन नहीं है. उनके बुजुर्ग बताते है कि पहले इतना पानी था कि किसी प्रकार की खेती या फ़सल नहीं उगाई जा सकती थी, स्थानीय किसान और ग्रामीण आस पास के क्षेत्रों की भूमि पर निर्भर रहते थे.
राजस्थान व मथुरा है सटा
सांधन के एक बुजर्ग वासुदेव ने बताया कि उनका यह गांव आगरा जिले का आखिरी गांव है. कहा कि उनके गांव से मथुरा जिले और राजस्थान का भरतपुर जिले का बॉर्डर लगता है. उन्होंने कहा कि उनके यहाँ से यह दोनों ही क्षेत्र बेहद नज़दीक है. बुजुर्ग वासुदेव ने बताया कि उनके गांव में पिछले 15 वर्षो से आलू की खेती हो रही है. पहले कई क्षेत्रों में पानी का स्तर अधिक ऊपर होने के कारण वहाँ खेती नहीं हो पाती थी.
लेकिन अब अधिकतर खेतो में आलू किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि पहले कि तुलना में पिछले कुछ सालों में उनके गांव में आलू की क्वालिटी अच्छी होने लगी है, जिस कारण आस पास क्षेत्रों में यह आलू सप्लाई किया जाता है जिसका अच्छा दाम व्यापारी किसान को देते है. उन्होंने कहा कि वह आलूओं को कोल्ड में रख आते है जिसके बाद दूर दराज से आने वाले व्यापारी आलू की खरीद करते है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें