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Traditional Stone Grinder: बिजली की चक्की और मिक्सर आने से पहले गांवों में हर घर की रसोई की शान हुआ करता था ‘जात’. पत्थर के दो गोल टुकड़ों से बना यह देसी यंत्र न सिर्फ शुद्ध और पौष्टिक आटा देता था, बल्कि इसके जरिए महिलाओं की सेहत भी अच्छी रहती थी. आज की नई पीढ़ी शायद ही इस पारंपरिक साधन के बारे में जानती हो, जो अब घरों से धीरे-धीरे गायब हो रहा है. आइए जानते हैं इतिहास बन चुके इस पारंपरिक यंत्र की बनावट और इसके बेहतरीन फायदों के बारे में.
सुल्तानपुर: आज के दौर में पैकेट बंद आटा और पिसे-पिलाए मसालों ने हमारी जिंदगी को बहुत आसान बना दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब गांवों में बिजली या बड़ी-बड़ी आधुनिक मशीनें नहीं हुआ करती थीं, तब गेहूं, चना और मसालों की पिसाई कैसे होती थी? आज की नई पीढ़ी को शायद ही इसकी जानकारी हो. उस समय हर ग्रामीण घर में अनाज पीसने के लिए पत्थर के एक देसी यंत्र का इस्तेमाल किया जाता था, जिसे ‘जात’ या ‘जाता’ कहते हैं. यह न सिर्फ शुद्ध भोजन का जरिया था, बल्कि ग्रामीण संस्कृति का एक अहम हिस्सा भी था.
पत्थर और लकड़ी के मेल से बनी हुई चक्की
ग्रामीण महिला ललिता देवी बताती हैं कि जात की बनावट काफी साधारण और मजबूत होती है. इसे गोल आकार में कटे हुए पत्थर के दो भारी टुकड़ों से बनाया जाता है. ये दोनों पत्थर एक के ऊपर एक फिट रहते हैं. नीचे का पत्थर अपनी जगह पर स्थिर रहता है, जबकि बीच में लकड़ी या लोहे की एक कील (गिल्ली) लगी होती है जिसके सहारे ऊपर वाला पत्थर घूमता है. ऊपरी हिस्से में अनाज डालने के लिए बीच में एक जगह होती है और पत्थर को घुमाने के लिए किनारे पर लकड़ी का एक हत्था लगाया जाता है. इसकी अंदरूनी सतह को खुरदुरा रखा जाता है ताकि पिसाई आसानी से हो सके. इसे चलाने के लिए अक्सर दो महिलाएं एक साथ मिलकर मेहनत करती थीं.
पारंपरिक रसोई और ग्रामीण जीवन में था खास महत्व
पुराने समय में जात केवल रसोई का एक साधन नहीं था, बल्कि दैनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा था. घर में रोजमर्रा का भोजन तैयार करने के लिए महिलाएं इसे एक जरूरी उपकरण के रूप में इस्तेमाल करती थीं. गेहूं से आटा बनाना हो, चना पीसकर बेसन तैयार करना हो या फिर दालें दलनी हों, यह हर काम में उपयोगी था. गांवों में यह लगभग हर घर में पाया जाता था और जरूरत पड़ने पर आस-पड़ोस की महिलाएं सामूहिक रूप से भी इसका उपयोग करती थीं. हालांकि, मशीनी युग आने के बाद अब यह पारंपरिक यंत्र लोगों के घरों से विलुप्त होता जा रहा है.
स्वाद, शुद्धता और अच्छी सेहत का प्रतीक
ललिता देवी आगे बताती हैं कि जात से पीसे गए अनाज और मसाले पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध होते हैं. आधुनिक चक्कियों की तरह इसमें बहुत तेज गति और हीटिंग नहीं होती, जिससे अनाज के जरूरी पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं. इसमें किसी भी तरह की मशीन या धातु का प्रभाव नहीं पड़ता, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसके अलावा, जांत चलाने से महिलाओं की अच्छी-खासी शारीरिक कसरत भी हो जाती थी, जो उन्हें स्वस्थ रखने में मदद करती थी.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें