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सिर्फ हाईवे नहीं, यूपी की तरक्की का इंजन है गंगा एक्सप्रेस-वे, कई धार्मिक स्थल होंगे कनेक्ट, तीर्थयात्रियों के लिए अब ‘सफर’ होगा सुहाना
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खुशबूदार चावल, कम लागत और बढ़िया रेट…बासमती धान की ये 5 किस्में किसानों को दिलाएंगी बंपर मुनाफा


होमफोटोकृषि

बासमती धान की ये 5 किस्में इस सीजन किसानों को दिलाएंगी बंपर मुनाफा

Last Updated:

Best Basmati Rice Varieties: भारत के बासमती चावल की खुशबू और लंबे दानों का डंका पूरी दुनिया में बजता है. इस समय देश के तमाम हिस्सों में धान की रोपाई का काम पूरे जोर-शोर से चल रहा है. बासमती की खेती से कम लागत में बंपर पैदावार और भारी मुनाफा कमाने के लिए सही किस्म का चुनाव और वैज्ञानिक तरीका अपनाना सबसे जरूरी होता है. कृषि एक्सपर्ट डॉ एनपी गुप्ता के अनुसार, अगर किसान भाई अपनी जमीन और समय के हिसाब से उन्नत बासमती किस्मों को चुनकर सही दूरी पर रोपाई करें, तो उनकी फसल सीधे एक्सपोर्ट क्वालिटी की तैयार होगी.

कृषि एक्सपर्ट डॉ एनपी गुप्ता ने बताया कि पूसा बासमती 1121 (Pusa Basmati 1121) किस्म पूरी दुनिया में अपने लंबे दानों के लिए मशहूर है. पकने के बाद इसके दाने आकार में दोगुने हो जाते हैं, जिससे बाजारों में इसकी मांग हमेशा चरम पर रहती है. इसे तैयार होने में लगभग 135 से 140 दिन का समय लगता है. जलभराव वाले क्षेत्रों को छोड़कर सामान्य सिंचाई वाले इलाकों के लिए यह बेहद उपयुक्त है. इसकी खेती से किसानों को कम लागत में निर्यात स्तर की गुणवत्ता और भारी मुनाफा मिलता है.

पूसा बासमती 1509 (Pusa Basmati 1509) कम समय में पककर तैयार होने वाली यह किस्म उन किसानों के लिए वरदान है जो धान के बाद दूसरी फसल की अगेती बुवाई करना चाहते हैं. यह मात्र 115 से 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. अवधि कम होने के कारण इसमें पानी की खपत काफी सीमित होती है और कीटों का हमला भी कम होता है. इसके दाने काफी चमकदार और खुशबूदार होते हैं, जिससे बाजार में इसका अच्छा भाव मिलता है.

पूसा बासमती 1718 (Pusa Basmati 1718)
यह पूसा 1121 का ही एक सुधरा हुआ रूप है, जिसे विशेष रूप से बीमारियों से लड़ने के लिए विकसित किया गया है. इसमें ‘बैक्टीरियल ब्लाइट’ यानी पत्ती झुलसा रोग के प्रति जबरदस्त रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है. रोग प्रतिरोधी होने के कारण किसानों का कीटनाशकों और रसायनों पर होने वाला खर्च काफी हद तक बच जाता है. यह किस्म भी 135-140 दिनों में पकती है और पैदावार के मामले में बेहद भरोसेमंद मानी जाती है.

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अगर आप अपनी फसल में पारंपरिक और असली बासमती का बेजोड़ स्वाद और महक चाहते हैं, तो बासमती 370 (Basmati 370) एक बेहतरीन विकल्प है. हालांकि इसकी फसल थोड़ी लंबी होती है और पकने में लगभग 140 से 150 दिन लेती है, लेकिन इसके चावल की खुशबू और गुणवत्ता लाजवाब होती है. जैविक खेती करने वाले किसानों के बीच इसकी मांग बहुत अधिक है, क्योंकि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसके प्रीमियम दाम मिलते हैं.

सीएसआर 30 (CSR 30)
किस्म उन इलाकों के लिए सबसे उत्तम है जहां की मिट्टी में खारापन या क्षारीयता अधिक है. सामान्य बासमती जहां ऊसर भूमि में दम तोड़ देती है, वहीं सीएसआर 30 विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतरीन पैदावार देती है. इसके दाने पतले, लंबे और अत्यधिक सुगंधित होते हैं. कम उपजाऊ या समस्याग्रस्त जमीनों में भी कम लागत के साथ यह किसानों को एक सुरक्षित और मुनाफेदार विकल्प देती है.

जुलाई के शुरुआती दिनों में जब मानसून पूरी तरह सक्रिय होता है, तब खेतों में 20 से 25 दिन पुरानी पौध की रोपाई कर देनी चाहिए. ध्यान रखें कि लाइन से लाइन की दूरी 20 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर होनी चाहिए. रोपाई के समय खेत में हल्का पानी रखें ताकि जड़ें आसानी से मिट्टी पकड़ सकें. सही समय और सही दूरी का तालमेल ही पौधों के कल्ले बढ़ाने में मदद करता है.

बासमती की खेती में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल से बचना चाहिए, क्योंकि इससे पौधे लंबे होकर गिर जाते हैं और सुगंध कम हो जाती है. इसके बजाय मिट्टी की जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित प्रयोग करें. बासमती को लगातार गहरे पानी की जरूरत नहीं होती, खेत में नमी बनाए रखना और कल्ले फूटते समय व दाना बनते समय पानी देना पर्याप्त होता है.

गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए फसल को तना छेदक और गर्दन तोड़ जैसी बीमारियों से बचाना जरूरी है. इसके लिए रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) अपनाएं. शुरुआत में ही ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) से भूमि और बीज का उपचार करें. खेतों की नियमित निगरानी करें और केवल जरूरत पड़ने पर ही कृषि एक्सपर्ट की सलाह से सही मात्रा में दवाओं का छिड़काव करें ताकि निर्यात की गुणवत्ता प्रभावित न हो.



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