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कनेर सजावटी के साथ आयुर्वेदिक पौधा भी है, वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति के अनुसार इसके फूल पत्ते त्वचा, घाव, सूजन में उपयोगी पर विषैले, बिना विशेषज्ञ सलाह न लें. लोकल 18 से बातचीत के दौरान गोंडा के आयुर्वेद विशेषज्ञ वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि कनेर के पौधे में कई ऐसे गुण पाए जाते हैं, जिनके कारण इसे आयुर्वेदिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है.हालांकि यह एक विषैला पौधा भी माना जाता है, इसलिए इसका उपयोग बिना जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह के कभी नहीं करना चाहिए.सही मात्रा और सही विधि से उपयोग करने पर ही इसके लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं.
कनेर का पौधा आमतौर पर घरों, बगीचों, पार्कों और मंदिरों के आसपास लगाया जाता है. इसके सुंदर और रंग-बिरंगे फूल लोगों का ध्यान आसानी से आकर्षित कर लेते हैं. सफेद, गुलाबी, लाल और पीले रंग के फूलों वाला यह पौधा सजावटी पौधों में काफी लोकप्रिय माना जाता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कनेर केवल सुंदरता बढ़ाने वाला पौधा ही नहीं है, बल्कि आयुर्वेद में भी इसका विशेष महत्व बताया गया है. इसके फूल, पत्तियां, जड़ और अन्य भागों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में लंबे समय से किया जाता रहा है.

लोकल 18 से बातचीत के दौरान गोंडा के आयुर्वेद विशेषज्ञ वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि कनेर के पौधे में कई ऐसे गुण पाए जाते हैं, जिनके कारण इसे आयुर्वेदिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है.हालांकि यह एक विषैला पौधा भी माना जाता है, इसलिए इसका उपयोग बिना जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह के कभी नहीं करना चाहिए.सही मात्रा और सही विधि से उपयोग करने पर ही इसके लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं.

वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति के अनुसार, कनेर की पत्तियों और फूलों का उपयोग पारंपरिक रूप से कुछ त्वचा संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है.ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसकी पत्तियों से लेप बनाकर त्वचा पर लगाते हैं.माना जाता है कि यह कुछ प्रकार की खुजली, फोड़े-फुंसियों और अन्य त्वचा रोगों में लाभ पहुंचा सकता है. हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए किसी भी प्रकार का प्रयोग करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है.
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आयुर्वेद में कनेर के फूलों को भी उपयोगी माना गया है. इसके फूलों का उपयोग कुछ पारंपरिक औषधीय तैयारियों में किया जाता है.वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि कनेर के फूलों में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर को विभिन्न प्रकार से लाभ पहुंचा सकते हैं. हालांकि इसके उपयोग की मात्रा और तरीका बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि गलत उपयोग स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है.

कनेर का उपयोग घाव भरने के लिए भी पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है.कुछ आयुर्वेदिक उपचारों में इसके पत्तों और छाल से तैयार औषधियों का प्रयोग पुराने घावों और त्वचा की समस्याओं में किया जाता है. हालांकि यह प्रयोग केवल प्रशिक्षित विशेषज्ञ की देखरेख में ही किया जाना चाहिए.

सूजन और दर्द से जुड़ी समस्याओं: आयुर्वेद में कनेर को सूजन और दर्द से जुड़ी समस्याओं में भी उपयोगी माना गया है. कुछ पारंपरिक उपचार पद्धतियों में इसके बाहरी उपयोग से जोड़ों के दर्द और सूजन में राहत मिलने की बात कही जाती है.कई वैद्य इसकी पत्तियों से तैयार लेप का उपयोग प्रभावित हिस्से पर करने की सलाह देते हैं, लेकिन इसकी मात्रा और विधि का विशेष ध्यान रखा जाता है.

पारंपरिक चिकित्सा में कनेर का उपयोग त्वचा पर होने वाले मस्सों और कुछ अन्य बाहरी विकारों के लिए भी किया जाता रहा है. इसके दूधिया रस का प्रयोग कुछ जगहों पर किया जाता है, लेकिन यह रस विषैला होता है और गलत प्रयोग से त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए इसका उपयोग बिना विशेषज्ञ सलाह के नहीं करना चाहिए.

वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि कनेर के फूलों का उपयोग भी कई आयुर्वेदिक तैयारियों में किया जाता है. कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसके फूलों में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो शरीर की कुछ समस्याओं में लाभकारी हो सकते हैं. हालांकि इनका प्रयोग नियंत्रित मात्रा में और विशेषज्ञ की देखरेख में ही किया जाता है.