लखनऊ में आयोजित चबूतरा थियेटर फेस्टिवल के दूसरे दिन ‘वाइफोफोबिया’ नाटक का मंचन किया गया। गोमती नगर स्थित अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान सभागार में हुई इस प्रस्तुति को दर्शकों ने सराहा। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से मदर सेवा संस्थान ने इस नाटक का आयोजन किया था। डॉ. राकेश ऋषभ द्वारा लिखित और वरिष्ठ रंगकर्मी महेश चंद्र देवा द्वारा निर्देशित यह नाटक ‘वाइफोफोबिया’ नामक एक काल्पनिक मनोवैज्ञानिक स्थिति पर आधारित है, जिसका अर्थ है पत्नी का डर। यह वैवाहिक जीवन में संवाद की कमी, तनाव और सामाजिक दबाव से उत्पन्न होने वाली जटिलताओं को दर्शाता है। अस्पताल में हास्यास्पद घटनाएं घटित होती हैं नाटक का मुख्य पात्र मगनलाल अपनी पत्नी शांति देवी से अत्यधिक भयभीत रहता है। वह इसे एक अनोखी बीमारी मानकर डॉ. मरणेंद्र और उनके कंपाउंडर झोकेंद्र से इलाज कराने पहुँचता है। इसके बाद अस्पताल में हास्यास्पद घटनाएँ घटित होती हैं, जिनमें एडवोकेट टूटन सिंह और फूटन सिंह जैसे पात्र भी शामिल होते हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब पति-पत्नी के बीच का तनाव तलाक तक पहुँच जाता है। मगनलाल को सपने में अपनी पत्नी शांति देवी द्वारा मारे जाने का दृश्य दिखाई देता है। हालाँकि, बाद में यह खुलासा होता है कि यह सब उसके मन का डर और ‘वाइफोफोबिया’ नामक एक किताब पढ़ने का परिणाम था। जब उसकी पत्नी और बेटियाँ मिली व लिली उससे डर का कारण पूछती हैं, तो वह अपनी समस्या बताता है। अंतिम दिन एकल नाटक ‘सारा जहां है हमारा’ का मंचन हास्य के माध्यम से नाटक ने यह संदेश दिया कि वैवाहिक जीवन में भय के बजाय प्रेम, सम्मान और आपसी समझ अधिक महत्वपूर्ण है। प्रस्तुति के समापन पर पद्मश्री डॉ. अनिल रस्तोगी, अमिता कनौजिया और अन्य अतिथियों ने निर्देशक महेश चंद्र देवा तथा पूरी टीम की सराहना की। यह फेस्टिवल का 10वां सीजन है, जिसमें बड़ी संख्या में दर्शक पहुँच रहे हैं। महोत्सव के अंतिम दिन एकल नाटक ‘सारा जहां है हमारा’ का मंचन किया जाएगा।
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लखनऊ चबूतरा फेस्टिवल: 'वाइफोफोबिया' नाटक का सफल मंचन:वैवाहिक जीवन की जटिलताओं पर आधारित था यह नाटक