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Agra News: आगरा विश्व का सबसे बड़ा और पुराना भालू सरंक्षण केंद्र भी है. यह सरंक्षण केंद्र सिकंदरा से दिल्ली की ओर रुनकता स्थित सूर सरोवर पक्षी विहार किठम झील में है, जहां वर्तमान में बंदी बनाये गए भालूओं को एक नया जीवनदान मिला है.
आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा को प्राचीन शहर कहा जाता है. मुगलों की राजधानी रहा यह शहर अपने एतेहासिक विरासत के लिए मशहूर है. इसके अलावा आगरा में विश्व का सबसे बड़ा और पुराना भालू सरंक्षण केंद्र भी है. यह सरंक्षण केंद्र सिकंदरा से दिल्ली की ओर रुनकता स्थित सूर सरोवर पक्षी विहार किठम झील में है, जहां वर्तमान में बंदी बनाये गए भालूओं को एक नया जीवनदान मिला है.
1999 में स्थापित इस केंद्र में पहली बार 2002 में पहला भालू रेस्क्यू कर लाया गया था. भालू सरंक्षण केंद्र में एक अस्पताल बना हुआ है, जो अत्याधुनिक मशीनों ने लेस है. यहां के चिकित्सक ने बताया कि मदारी (कलंदर) के पास से रेस्क्यू कर लाये जाने वाले भालूओं में कई तरह की बीमारियां होती है. सबसे ज्यादा समस्या भालू की नाक को लेकर है.
खाना ना मिलने से उनके दांत कमजोर
उन्होंने कहा कि मदारी खेल दिखाने के लिए भालू की नाक में नुकीली वस्तु से छेद आर-पार कर देते हैं और उसने रस्सी बांध देते हैं, जिससे भालू को रस्सी से ऊपर खींचे तो वह दर्द के कारण उछलता है और लोग समझते हैं कि वह डांस कर रहा है. दूसरा उचित खाना ना मिलने से उनके दांत कमजोर हो जाते हैं, लिवर आदि कई समस्या देखने को मिलती है. इनका यहां कुशलता से इलाज किया जाता है. उन्होंने कहा कि उचित इलाज के बाद उन्हें एक नई जिंदगी मिलती है और वह फिर आराम से बिना दर्द के यहां रहते हैं.
मदारी करते थे भालूओं के साथ अत्याचार
आगरा के भालू सरंक्षण केंद्र में सेवा दे रहे वाइल्डलाइफ एसओएस की पशु चिकित्सा सेवाओं के उप निदेशक ने बताया कि उस दौर में कलंदर (मदारी) भालूओं के साथ अत्याचार करते थे. उन्होंने कहा कि मदारी भालू के संवेदनशील अंग यानि थूथन (muzzle) में गर्म लोहे की छड़ से छेद करके एक मोटी रस्सी आर-पार करके बांधते थे. दर्द के कारण जब मदारी रस्सी खींचता था, तो भालू उछलने-कूदने लगता था, जिसे वह डांस का शब्द कहते थे. इसके अतिरिक्त मदारी भालूओं के दांत तक तोड़ देते थे.
मदारी तोड़ देते हैं दांत
उप निदेशक ने बताया कि भालूओं के आक्रामक होने से बचाने के लिए क्रूरतापूर्वक उनके कैनाइन दांत तोड़ दिए जाते थे, जिससे वह किसी या खुद मदारी पर हमला ना कर सके. इसके अलावा भालूओं को हर वक़्त बांधकर रखा जाता था, जिससे उनका मानसिक स्तर कम होने लगा. समय पर उचित भोजन नहीं मिलना यह सब कारण रहे कि भालू मदारी के पास सुरक्षित नहीं रह पाते थे. किसी दौर का यह खेल वर्तमान में पूरी तरह से प्रतिबंधित हो चुका है. कहा जा सकता है कि इस 400 साल पुरानी क्रूर प्रथा का अंत मुख्य रूप से वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस जैसी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से हुआ है.
400 साल पुराने भालू के खेल पर लगा प्रतिबंध
भालूओं पर बढ़ते अत्याचार और क्रूरता के कारण सरकार ने वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस के सहयोग से इस प्राचीन खेल पर रोक लगा दी. आगरा के भालू सरंक्षण केंद्र पर मौजूद चिकित्सक इलयाराजा एस. ने बताया कि मदारी भालूओं पर इस कदर अत्याचार करते थे कि जब वह यहां रेस्क्यू कर लाये जाते थे, तो उनके इलाज करने में लम्बा वक़्त लगता था, क्योंकि वह काफी अधिक बीमार पड़ चुके होते थे. हर वक़्त बंदी बने रहना, दांतो को तोड़ देना और नाक में छेद करना भालूओं के लिए बेहद पीड़ा के छण होते थे. ऐसे ने उनका यहां बेहतर और अनुभवी पशु चिकित्सकों के माध्यम से इलाज किया जाता है. यही सब कारण रहे कि इस खेल पर रोक लगाई गई.
खेल दिखाना गैरकानूनी
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद भालू को पालना और उनका खेल दिखाना गैरकानूनी हो गया. हालांकि, जागरूकता और सख्ती की कमी के कारण यह प्रथा कई सालों तक छिप-छिपकर चलती रही. उसके बाद वाइल्डलाइफ एसओएस और अन्य संस्थाओं ने मदारियों के गांवों में जाकर इस क्रूरता के खिलाफ जांच की और सरकार को रिपोर्ट सौंपी. तब जाकर सरकार ने सख्ती बढ़ाते हुए इस प्रथा को पूरी तरह से खत्म करने के लिए अभियान चलाया और उसमे सफलता भी मिली. इस प्रथा का अंत तब हुआ, जब भारत की सड़कों पर नाचने वाले अंतिम भालू को सन 2009 में छुड़ा लिया गया.
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आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.