भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई की नई प्रदेश टीम को सिर्फ संगठनात्मक फेरबदल के रूप में नहीं देखा जा रहा है. साल 2027 के विधानसभा चुनाव से लगभग डेढ़ वर्ष पहले घोषित की गई इस टीम में पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी रणनीति अब केवल सवर्ण समर्थन के भरोसे नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने पर केंद्रित है.
हाल में सवर्णों से जुड़े कुछ घटनाक्रमों जैसे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके बटुकों के अपमान, यूजीसी के नए नियमों के बाद बीजेपी अपने वोटबैंक को और व्यापक बनाने की कोशिश में है. ताकि किसी एक वर्ग की नाराजगी उस पर भारी न पड़े. इसके लिए बीजेपी NYO-NJD फॉर्मूले पर काम करती दिख रही है. यानी गैर यादव ओबीसी (Non Yadav OBC) और गैर जाटव दलित (Non Jatav Dalit).
प्रदेश की नई टीम में क्या हैं समीकरण?
प्रदेश की नई टीम में 19 उपाध्यक्षों में 7 ओबीसी, 10 सामान्य वर्ग और 2 अनुसूचित जाति वर्ग से हैं. वहीं क्षेत्रीय अध्यक्षों के छह पदों में चार ओबीसी और दो सवर्ण नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है. इससे साफ है कि संगठनात्मक स्तर पर बीजेपी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन साधने की कोशिश की है.
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दरअसल, उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना ही ऐसी है कि बिना ओबीसी और दलित वोटों के कोई भी दल सत्ता तक नहीं पहुंच सकता. राज्य में सवर्ण आबादी लगभग 17 से 19 % मानी जाती है, जबकि ओबीसी आबादी 40 से 41 % और दलित आबादी 20 से 21 % के बीच है. मुस्लिम आबादी करीब 19 % है. ऐसे में ओबीसी और दलित वर्ग मिलाकर राज्य की 60 % से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं.
यही वजह है कि बीजेपी की नई टीम में सबसे ज्यादा ध्यान गैर-यादव ओबीसी समूहों पर दिखाई देता है. इनमें कुर्मी, लोधी, मौर्य, राजभर, निषाद, गुर्जर और अन्य पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है.
क्या है चुनावी गणित?
इसके पीछे चुनावी आंकड़ों का गणित भी है. सीएसडीएस-लोकनीति के अनुसार साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी नीत एनडीए को गैर-यादव ओबीसी वोटों का 59 % समर्थन मिला था, जबकि इंडिया गठबंधन को 34 % वोट प्राप्त हुए. कुर्मी-कोइरी समुदाय में एनडीए को 61 % वोट मिले थे. हालांकि साल 2019 की तुलना में इन वर्गों में बीजेपी का समर्थन कुछ घटा है. साल 2019 में कुर्मी-कोइरी वर्ग का 80 % और गैर-यादव ओबीसी का 72 % वोट बीजेपी गठबंधन के साथ था.
बीजेपी नेतृत्व इसी गिरावट को रोकने और गैर-यादव पिछड़े वर्गों को अपने साथ मजबूती से बनाए रखने की रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है. यही कारण है कि नई टीम में पिछड़े वर्गों को प्रमुख पदों पर पर्याप्त स्थान दिया गया है.
दलित वोट बैंक भी बीजेपी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. साल 2024 लोकसभा चुनाव में जाटव समुदाय का केवल 24 % वोट एनडीए को मिला, जबकि 44 % वोट बसपा के साथ गया. दूसरी तरफ गैर-जाटव दलित वर्ग में एनडीए को 29 % समर्थन मिला, जबकि इंडिया गठबंधन को 56 % वोट प्राप्त हुए. यह आंकड़े बीजेपी के लिए चिंता का विषय हैं क्योंकि साल 2017 और साल 2022 के विधानसभा चुनावों में गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ था.
साल 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को अन्य अनुसूचित जातियों का 41 % वोट मिला था, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन को 23 % वोट मिले थे. इसी वजह से पार्टी संगठन में अनुसूचित जाति समुदाय को भी प्रतिनिधित्व देकर इस सामाजिक आधार को बनाए रखने की कोशिश कर रही है.
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सवर्ण वोट बैंक बीजेपी की ताकत लेकिन…
सवर्ण वोट बैंक बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है. साल 2024 लोकसभा चुनाव में ऊंची जातियों के 79 % वोट एनडीए के पक्ष में गए थे. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों के 89 %, राजपूतों के 87 %, वैश्यों के 83 % और अन्य सवर्ण समूहों के 78 % वोट बीजेपी गठबंधन को मिले थे. यही कारण है कि पार्टी ने अपनी नई टीम में सवर्ण नेताओं को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है ताकि पारंपरिक वोट बैंक में किसी प्रकार का असंतोष न पैदा हो.
दिलचस्प बात यह है कि यादव और मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बीजेपी की रणनीति अलग दिखाई देती है. साल 2024 लोकसभा चुनाव में यादवों का 82 % और मुसलमानों का 92 % वोट इंडिया गठबंधन के साथ गया था. साल 2022 विधानसभा चुनाव में भी यादवों का 83 % और मुसलमानों का 79 % वोट समाजवादी पार्टी गठबंधन को मिला था. ऐसे में बीजेपी की प्राथमिकता इन वर्गों में बड़ी सेंध लगाने की बजाय गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और सवर्ण वोटों के अपने गठबंधन को और मजबूत करना नजर आती है.
नई प्रदेश टीम के गठन को इसी सामाजिक और चुनावी गणित के संदर्भ में देखा जा रहा है. संगठन में ओबीसी, दलित और सवर्ण नेतृत्व का संतुलन बताता है कि बीजेपी साल 2027 की चुनावी लड़ाई में उसी सामाजिक समीकरण को और मजबूत करना चाहती है जिसने पिछले एक दशक में उसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में बढ़त दिलाई है. अब देखना होगा कि संगठन का यह नया सामाजिक संतुलन चुनावी मैदान में कितना प्रभावी साबित होता है.
Input By : रिसर्च- दुष्यंत शेखर