यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को सपा मुखिया अखिलेश यादव पर तीखा हमला किया. अयोध्या श्रीराम मंदिर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, डॉक्टर लोहिया के कारण कभी चित्रकूट और प्रदेश के अन्य भागों में रामायण मेला का शुभारंभ हुआ था. और आज के समाजवादी! राम से दूरी बनाते हैं. सीएम योगी का यह बयान सिर्फ एक कटाक्ष नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक रोचक किस्सा है.
भारतीय राजनीति में समाजवाद के सबसे बड़े पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया का प्रभु श्रीराम और भारतीय संस्कृति से एक अटूट रिश्ता था. आज की राजनीति में भले ही समाजवाद और धर्म को अलग-अलग चश्मे से देखा जाता हो, लेकिन लोहिया की दृष्टि में राम, कृष्ण और शिव इस देश को जोड़ने वाले सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीक थे.
लोहिया का रामायण मेला
श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास का सबसे लंबा समय लगभग साढ़े ग्यारह साल चित्रकूट में बिताया था. डॉ. राममनोहर लोहिया का मानना था कि श्रीराम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरे भारत को सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने वाले महानायक हैं. इसी विचार के साथ, सन् 1961 में डॉ. राममनोहर लोहिया ने पहली बार रामायण मेला आयोजित करने की भव्य परिकल्पना की थी.
उनका उद्देश्य एक ऐसे मंच का निर्माण करना था जहां विद्वान, संत, कलाकार और आम जनमानस एक साथ आएं और रामकथा के आदर्शों मर्यादा, समता और बंधुत्व पर चर्चा करें. लोहिया जी चाहते थे कि यह मेला लोक-संस्कृति का एक ऐसा उत्सव बने जहां समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी श्रीराम के जीवन से प्रेरणा ले सके.
12 साल की कोशिश के बाद 1973 का पहला रामायण मेला
डॉ. लोहिया की यह परिकल्पना रातों-रात जमीन पर नहीं उतरी. इसे अपने वास्तविक और साकार रूप में आने में पूरे 12 साल का लंबा समय लगा. इस लंबे अरसे में चित्रकूट के कई स्थानीय दिग्गजों और विचारकों ने अथक परिश्रम किया.
शुरुआती दौर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बलदेव प्रसाद गुप्त ने इस वैचारिक ज्योति को जलाए रखा और बाद के दौर में बाबूलाल गर्ग (जो बाद में रामायण मेला के संयोजक बने) की सतत साधना ने इसे मुकाम तक पहुंचाया. जब-जब लोहिया जी चित्रकूट आते थे, तब बलदेव प्रसाद गुप्त ही उनकी आवभगत और स्थानीय तैयारियों की भूमिका में सबसे आगे रहते थे. लोहिया जी के साथ अक्सर उनके करीबी और प्रखर समाजवादी नेता राज नारायण भी चित्रकूट आते थे.
तमाम प्रयासों के बाद, आखिरकार सन् 1973 में पहली बार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी की कोशिशों से चित्रकूट में रामायण मेले का भव्य आयोजन संभव हो सका. यह वर्ष विशेष महत्व रखता था क्योंकि 1973 में ही गोस्वामी तुलसीदास की रचना रामचरितमानस के 400 वर्ष पूरे हुए थे. इसी मानस चतुर्थशती के ऐतिहासिक अवसर पर इस मेले को साकार रूप दिया गया.
जब राज नारायण ने चादर ओढ़कर खिंचवाई फोटो
रामायण मेले की तैयारियों के उस दौर से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प और सादगी भरा किस्सा है, जो बलदेव प्रसाद गुप्ता जी के सौजन्य से इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. एक बार डॉ. लोहिया रामायण मेले की तैयारियों के सिलसिले में कर्वी (चित्रकूट) आए हुए थे. उनके साथ राज नारायण भी मौजूद थे. मीटिंग समाप्त होने के बाद यह तय हुआ कि इस ऐतिहासिक क्षण की एक ग्रुप फोटो ली जाए. फोटोग्राफर को बुला लिया गया, लेकिन तभी एक अजीबोगरीब समस्या खड़ी हो गई. राज नारायण जी परेशान हो उठे क्योंकि उनके कपड़े धुलने के लिए गए हुए थे. उन्होंने असमंजस में पूछा कि अब मैं इस तस्वीर में क्या पहनकर बैठूं?
इस पर डॉ. लोहिया ने अपने ठेठ और बेबाक अंदाज में कहा, यही बिस्तर की चादर ओढ़ के बैठ जाओ. और वाकई ऐसा ही हुआ! राज नारायण जी ने तनिक भी संकोच नहीं किया, उन्होंने बिस्तर की चादर ओढ़ी और तस्वीर खिंचवा ली.यह ऐतिहासिक और दुर्लभ चित्र बलदेव प्रसाद गुप्त जी के पास सुरक्षित था. बाद में जब रामायण मेले के इतिहास को सहेजने की बात आई, तो एक जानकार ने गुप्ता जी से कहा, यह महत्वपूर्ण चित्र आपके खजाने में ही रखा रह जाएगा और दुनिया इसे देखने से वंचित रह जाएगी. इसे सार्वजनिक होना चाहिए. गुप्ता जी ने सहर्ष वह तस्वीर दी. उसकी कई कॉपियां बनवाई गईं और आचार्य गर्ग जी को सौंपी गईं. यह दुर्लभ तस्वीर बाद में रामायण मेला की स्मारिका में प्रमुखता से प्रकाशित की गई, जो उस दौर के दिग्गज नेताओं की सादगी और श्रीराम के प्रति उनके समर्पण का जीता-जागता प्रमाण है.