बिहार के बक्सर में भरत तिवारी के कथित पुलिस एनकाउंटर ने सीमा पार उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में एक बहुत बड़ा राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है. कहने को तो यह घटना बिहार की सीमा के भीतर हुई है, लेकिन भरत तिवारी जिस जाति से आते हैं, उस जाति ब्राह्मण जाति का सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व यूपी के पूर्वांचल में फैला हुआ है. बिहार पुलिस की इस एनकाउंटर की चर्चा यूपी में होने लगी है. अब इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश की सियासत पर भी देखने को मिल रहा है. मायावती से लेकर अखिलेश यादव इसको भुनाने में लग गए हैं. अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले यह एनकाउंटर क्या बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा?
पूर्वांचल के जिलों बलिया, गाजीपुर, मऊ, वाराणसी और जौनपुर में इस घटना को लेकर ब्राह्मण समाज के भीतर अंदरूनी सुगबुगाहट और नाराजगी देखी जा रही है, जिसे भुनाने के लिए समाजवादी पार्टी और बीएसपी अभी से ही लग गई है. भारतीय जनता पार्टी के नेता भी डैमेज कंट्रोल करने में लगे हैं. यूपी सरकार के सूत्रों की मानें तो अभी पूर्वांचल में कई ब्राह्मण बाहुबलियों के खिलाफ किसी भी तरह का एनकाउंटर चाहे लंगड़ा ऑपरेशन चलाने से सख्त मना कर दिया गया है. क्योंकि, अभी बिहार में भरत तिवारी को लेकर बवाल मचा है, उसी तरह का बवाल यूपी में न हो जाए.
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ब्राह्मण वोट बैंक के लिए सपा और बीजेपी में रस्साकसी
पूर्वांचल की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता हमेशा से ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहे हैं. लगभग 12 से 14 प्रतिशत की आबादी वाले इस वर्ग का झुकाव जिस तरफ होता है, सत्ता की चाबी उसी के पास जाती है. समाजवादी पार्टी ने भी बिहार में भरत तिवारी के एनकाउंटर पर सीधे तौर पर सवाल उठाते हुए इसे सत्ता समर्थित ‘टारगेटेड किलिंग’ का नाम देने की कोशिश की है. सपा नेताओं का आरोप है कि एक खास जाति के अपराधियों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अन्य को संरक्षण मिल रहा है. सपा इस मुद्दे के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि वह ब्राह्मणों के मान-सम्मान की लड़ाई लड़ रही है.
बीजेपी का डिफेंसिव और आक्रामक स्टैंड
बीजेपी इस मामले में कानून-व्यवस्था का हवाला दे रही है. हालांकि, पार्टी के भीतर के ब्राह्मण नेता भी इस बात को लेकर सतर्क हैं कि जमीन पर कोई गलत नैरेटिव न बन पाए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को सही ठहराते हुए बीजेपी नेता साफ कर रहे हैं कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती, लेकिन आंतरिक रूप से डैमेज कंट्रोल की तैयारी भी शुरू हो चुकी है.
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती शांत रहकर एक बड़ी चाल चलने की फिराक में हैं.
मायावती का सोशल इंजीनियरिंग कार्ड
इस पूरे विवाद के बीच बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती शांत रहकर एक बड़ी चाल चलने की फिराक में हैं. इतिहास गवाह है कि साल 2007 में मायावती ने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के तहत दलित-ब्राह्मण गठजोड़ बनाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी.
सतीश चंद्र मिश्रा का पुराना फॉर्मूला: बसपा एक बार फिर अपने ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा के जरिए पूर्वांचल में सक्रिय होने की योजना बना रही है. मायावती का सोचना है कि यदि सपा और बीजेपी के बीच इस एनकाउंटर को लेकर ब्राह्मण वोट बैंक में बिखराव होता है, तो बसपा खुद को एक सुरक्षित और न्यायप्रिय विकल्प के रूप में पेश कर मौके पर चौका मार सकती है.
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2027 के चुनाव पर कितना बड़ा होगा असर?
भरत तिवारी एनकाउंटर का समय उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिहाज से बेहद नाजुक है. पूर्वांचल की लगभग 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता सीधे तौर पर हार-जीत तय करते हैं. साल 2022 के चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने पासा पलट दिया था.
अब, इस ताजा एनकाउंटर के बाद यदि विपक्ष ब्राह्मणों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करने में कामयाब रहता है, तो बीजेपी के लिए अपने इस पारंपरिक वोट बैंक को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा. यही वजह है कि बक्सर में चली गोली की गूंज इस समय लखनऊ के सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा यूपी चुनाव 2027 का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है.