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सिर्फ हाईवे नहीं, यूपी की तरक्की का इंजन है गंगा एक्सप्रेस-वे, कई धार्मिक स्थल होंगे कनेक्ट, तीर्थयात्रियों के लिए अब ‘सफर’ होगा सुहाना
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Farming Tips: दवाइयां भी बेअसर? धान की फसल में इस तरह करें मोथा घास का जड़ से सफाया, पैदावार होगी अच्छी


शाहजहांपुर: धान के खेतों में मोथा घास (Nut grass) किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गई है. यह खतरनाक खरपतवार फसल के जरूरी पोषक तत्वों को सोखकर उसे पूरी तरह बर्बाद कर देती है. इसकी समय पर रोकथाम बेहद जरूरी है. इसके लिए खेत में हल्की नमी होने पर किसी बेहतरीन खरपतवार नाशक का छिड़काव करना सबसे असरदार उपाय है. रासायनिक उपायों के अलावा, जैविक और पारंपरिक तरीकों से भी इस पर काबू पाया जा सकता है. मोथा घास कई सालों तक चलने वाला और बेहद जिद्दी खरपतवार है, जो नमी वाले इलाकों, खासकर धान के खेतों में तेजी से पनपता है.

इसकी जड़ें जमीन के काफी नीचे तक जाती हैं, जहां छोटी-छोटी गांठें बन जाती हैं. यही गांठें इसकी असली ताकत हैं, क्योंकि ऊपरी हिस्सा कटने के बाद भी ये जमीन के अंदर सुरक्षित रहती हैं और दोबारा नई घास को जन्म देती हैं. यह घास धान के पौधों को मिलने वाली खाद, पानी और धूप को खुद सोख लेती है, जिससे मुख्य फसल कमजोर होकर दम तोड़ देती है.

प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह ने बताया कि कि मोथा घास पर पूरी तरह नियंत्रण पाना सिर्फ रासायनिक दवाओं से संभव नहीं है, इसके लिए एक एकीकृत प्रबंधन (Integrated Management) की जरूरत होती है. हेलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल 75% WG (Halosulfuron-methyl)का इस्तेमाल खड़ी फसल में मोथा को बढ़ने से रोकने के लिए एक बेहतरीन हथियार है, लेकिन इसके छिड़काव के समय खेत में हल्की नमी का होना जरूरी है, अन्यथा दवा पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगी. इसके साथ ही फसल कटाई के बाद जब खेत खाली हो, तब ग्लाइफोसेट (Glyphosate) का छिड़काव करना चाहिए ताकि यह जड़ों और गांठों तक पहुंचकर उन्हें नष्ट कर सके. केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक नियंत्रण जैसे समय पर निराई-गुड़ाई और गहरी जुताई करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि इसकी गांठें धूप में सूखकर हमेशा के लिए खत्म हो जाएं.

फसल पर मोथा घास का प्रभाव
मोथा घास धान की फसल के लिए एक साइलेंट किलर की तरह होती है. इसकी विकास दर धान के पौधे से कहीं ज्यादा तेज होती है, जिसके कारण यह बहुत कम समय में पूरे खेत को अपने आगोश में ले लेती है. यह खरपतवार मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे महत्वपूर्ण तत्वों को खुद खींच लेती है. परिणामस्वरूप, धान के पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता, उनका विकास रुक जाता है और पैदावार में भारी गिरावट आती है.

रासायनिक नियंत्रण और सही तरीका
इस जिद्दी खरपतवार से निपटने के लिए रासायनिक नियंत्रण एक त्वरित और प्रभावी रास्ता है. धान की खड़ी फसल में जब मोथा का प्रकोप दिखने लगे, तब ‘हेलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल’ का छिड़काव करें. ध्यान रहे कि छिड़काव के वक्त मिट्टी में हल्की नमी होनी चाहिए ताकि दवा जड़ों तक आसानी से अवशोषित हो सके. इसके अलावा, अगर खेत खाली पड़ा हो और अगली फसल की तैयारी चल रही हो, तो ‘ग्लाइफोसेट’ का छिड़काव इसकी जड़ों को जड़ से खत्म करने में मदद करता है.

जैविक एवं पारंपरिक उपाय
केवल रसायनों के भरोसे रहने के बजाय पारंपरिक और जैविक तरीके मोथा घास को स्थायी रूप से कमजोर करते हैं. समय-समय पर की जाने वाली निराई-गुड़ाई (Weeding and Hoeing) इसके विकास चक्र को तोड़ देती है. जब मजदूर खुरपी की मदद से इसे उखाड़ते हैं, तो इसके ऊपरी हिस्से के साथ कुछ गांठें भी बाहर आ जाती हैं. जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए यह तरीका न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी बनाए रखता है.

गर्मियों में गहरी जुताई का महत्व
मोथा घास की असली ताकत जमीन के नीचे छिपी इसकी गांठें होती हैं. इनसे पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए फसल चक्र के बीच में, विशेषकर तेज गर्मियों के दिनों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए. जुताई करने से जमीन के अंदर दबी हुई मोथा की गांठें ऊपर आ जाती हैं. कड़कती धूप में जब ये गांठें सीधे संपर्क में आती हैं, तो पूरी तरह सूखकर बेअसर हो जाती हैं और मॉनसून में दोबारा नहीं पनपतीं हैं.



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