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संभल अपनी ऐतिहासिक धरोहर, धार्मिक आस्था और अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहां का घंटाघर मंदिर, प्राचीन किले, बूढ़े बाबा का मंदिर, हनुमान-शिव मंदिर और छतरी वाला कुआं प्रमुख आकर्षण हैं. मुगलकालीन वास्तुकला से लेकर आस्था के केंद्रों तक, संभल घूमने के लिए एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है जहां इतिहास और संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिलता है.
संभल अपनी ऐतिहासिक धरोहर और अलग-अलग मंदिर और मान्यताओं को लेकर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है तो वहीं इस संभल में पांच ऐसी जगह है. जो घूमने के लिए बेस्ट मानी जाती है. जिसमें संभल का घंटाघर शामिल है. संभल का पुराना किला, बूढ़े बाबा का मंदिर, हनुमान मंदिर, छतरी वाला कुआं शामिल है. ये पांच जगह बेस्ट मानी जाती हैं. आप यहां घूम कर इंजॉय कर सकते हैं और अलग-अलग चीजों का अनुभव ले सकते हैं.

संभल का ऐतिहासिक घंटाघर मंदिर और क्लॉक टावर शहर की सबसे बड़ी पहचान है. तहसील रोड पर स्थित यह धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल दूर-दूर से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है. संभल घूमने आने वाले लोग घंटाघर देखे बिना वापस नहीं जाते. मान्यता है कि इसका निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था और इसका इतिहास 1000 साल से भी अधिक पुराना है. मंदिर परिसर में लगे विशाल घंटे के कारण इसका नाम घंटाघर मंदिर पड़ा. यहाँ भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है जहाँ रोज जलाभिषेक और पूजा होती है.

संभल का घंटाघर सिर्फ समय बताने वाली मीनार नहीं था बल्कि शहर की धड़कन था. लगभग 20 साल तक घड़ी बंद रहने से इसकी रौनक फीकी पड़ गई थी. 2024 में नगर पालिका अध्यक्ष आशिया मुशीर और सभासद चंचल गुप्ता के नेतृत्व में इसका जीर्णोद्धार हुआ था. राजस्थानी पत्थर से सुंदरता बढ़ाई गई नई लाइटें लगाई गईं और घड़ी फिर चालू हुई. अब हर घंटे की मधुर आवाज से पूरा इलाका गूंज उठता है. लोग यहाँ सच्चे मन से मनोकामना लेकर आते हैं. भक्तों का विश्वास है कि बाबा भोलेनाथ सबकी मुराद पूरी करते हैं. शाम को लाइटों से जगमगाता घंटाघर देखने लायक होता है और सेल्फी पॉइंट भी बन गया है.
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संभल अपने मुगलकालीन किलों के लिए जाना जाता है. यहाँ के दो प्रमुख ऐतिहासिक किले फिरोजपुर किला और मोहम्मदपुर सौंधन किला घूमने के लिए बेहतरीन जगह हैं. दोनों एएसआई संरक्षित धरोहरें हैं और अब पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रही हैं.फिरोजपुर किला संभल से 5 किमी दूर सोत नदी के किनारे बना है. इसका निर्माण 1656 से 1659 के बीच मुगल बादशाह शाहजहां के आदेश पर उनके दरबारी सैय्यद फिरोज के लिए हुआ था. मोहम्मदपुर सौंधन किला 1645 में बना करीब 400 साल पुराना किला है. जो 3600 वर्ग मीटर में फैला है. दोनों किलों में ऊँची मजबूत दीवारें भव्य मेहराबें बुर्ज और पहरेदार कक्ष बने हैं.

फिरोजपुर किले में चांद महल और सूरज महल बने थे जो मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं. यहाँ से दिल्ली तक जाने वाली रहस्यमयी सुरंग भी बताई जाती है. सौंधन किले की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक मरम्मत है. एएसआई की देखरेख में राजस्थान-झांसी के कारीगरों ने चूना सुर्खी बेलगिरी गुड़ और धूल के मिश्रण से इसे संवार दिया है. लंबे समय तक उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार रहे सौंधन किले को 29 लाख की लागत से फरवरी 2026 में फिर से जीवंत किया गया. ढह चुका मुख्य द्वार और पहरेदार कक्ष अब पुरानी भव्यता में लौट आए हैं.

संभल के असमोली कस्बे और सारंगपुर गांव में स्थित बूढ़े बाबा का मंदिर आस्था और एकता का प्रतीक है. यह एक प्राचीन थान/मंदिर है जिसके पास पवित्र तालाब बना है. असमोली वाला मंदिर 100 साल से अधिक पुराना है.यहाँ हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल मिलती है. हर साल दूज और भाद्रपद-मार्गशीर्ष की द्वितीया पर बड़ा मेला लगता है. मान्यता है कि तालाब में स्नान और भभूत लगाने से चर्म रोग दूर होते हैं. सात प्रकार का अनाज और प्रसाद चढ़ाने की परंपरा है. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी कल्कि धाम शिलान्यास में बूढ़े बाबा के जयकारे लगाए थे. दूर-दूर से श्रद्धालु मन्नत लेकर आते हैं.

संभल के खग्गू सराय दीपा सराय में स्थित प्राचीन शिव-हनुमान मंदिर 46 साल बाद फिर से गुलजार हुआ है.यह शिव-हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है जहाँ शिवलिंग नंदी हनुमान जी और कार्तिकेय जी की मूर्तियाँ हैं. पास में एक प्राचीन कुआं भी मिला. 1978 के दंगों के बाद हिंदू पलायन से मंदिर बंद हो गया था. दिसंबर 2024 में बिजली चेकिंग अभियान में प्रशासन ने ताला खुलवाया गया था.सफाई बिजली और सीसीटीवी लगाकर पूजा शुरू हुई थी. भक्तों का विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से पूजा करने पर बजरंगबली सारे संकट हर लेते हैं. अब रोज सुबह आरती हनुमान चालीसा पाठ होता है.यह मंदिर संभल की खोई आस्था को फिर से जगा रहा हैं.

संभल में छतरी वाला कुआं एक ऐतिहासिक कुआं है जो अब चर्चा में है. यह एकता पुलिस चौकी के पास स्थित है और छतरीनुमा संरचना के नीचे दबा हुआ था. यह दशकों से बंद पड़ा प्राचीन कुआं है. 1978 के दंगों के बाद इसे पाट दिया गया था. ऊपर पेड़ उग आया और चबूतरा बना दिया गया. 2025 में प्रशासन ने जेसीबी से खुदाई शुरू कराई. स्थानीय लोगों के अनुसार 1978 के दंगे में व्यापारी रामचरण दास रस्तोगी की हत्या कर शव इसी कुएं में फेंका गया था. यह संभल के पुराने वैभव से जुड़ा है.