‘तेरा करूं दिन गिन-गिन के इंतजार…’, ‘परदेसी परदेसी जाना नहीं…’ जैसे सदाबहार गानों से भारतीय सिनेमा को समृद्ध करने वाली और 7 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीत चुकीं मशहूर पार्श्व गायिका अलका याग्निक को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। इस घोषणा के बाद से ही अलीगढ़ में रह रहे उनके परिवार और शुभचिंतकों में खुशी का ठिकाना नहीं है। रामघाट रोड से सटे सुरेंद्रनगर के एक पुराने आशियाने में अलका याग्निक के चचेरे भाई आलोक याग्निक रहते हैं। उन्होंने अलका के बचपन, कड़े अनुशासन और अलीगढ़ की मिट्टी से उनके जुड़ाव के कई अनसुने किस्से साझा किए। दादाजी थे प्रिंसिपल, अलीगढ़ से गहरा नाता आलोक याग्निक ने बताया कि याग्निक परिवार की जड़ें अलीगढ़ से बेहद गहराई से जुड़ी हैं। उनके दादाजी अलीगढ़ के प्रसिद्ध डीएवी इंटर कॉलेज में प्रिंसिपल थे। उनके पिता चार भाई थे, जिनमें अलका के पापा सबसे छोटे थे। चारों भाइयों की शिक्षा इसी कॉलेज से हुई थी। बाद में अलका के पिता नौकरी के सिलसिले में कोलकाता शिफ्ट हो गए थे। जब काका जी कोलकाता चले गए, तब भी हर साल गर्मियों की छुट्टियों में तीनों भाई अपने बच्चों के साथ अलीगढ़ आया करते थे। चारों परिवारों के जुटने से घर में पूरा धमाल मचता था। जब बच्चे खाते थे टिक्की-पटाखे, अलका खाती थीं मोनेको बिस्कुट आलोक ने अलका के सुरों के पीछे छिपी उनकी मां की कड़ी तपस्या का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अलका की मां ही उनकी पहली शास्त्रीय संगीत गुरु रही हैं। जब छुट्टियों में सब बच्चे बगीचे में खेल रहे होते थे, तब चाची जी 6-7 साल की अलका को लेकर घर के किसी शांत कोने में बैठ जाती थीं और घंटों सुरों का अभ्यास कराती थीं। स्वाद पर कड़ा पहरा आलोक बताते हैं कि जब हम सब बच्चे रेलवे रोड पर चाट, टिक्की और पकौड़े खाने जाते थे, तो अलका के लिए घर से गर्म और सादा पानी का थर्मस साथ भेजा जाता था। स्नैक्स के नाम पर उन्हें सिर्फ नमकीन मोनेको बिस्कुट मिलते थे। हम बच्चे जानबूझकर उन्हें चिढ़ाकर चाट खाते थे। इस पर चाची कहती थीं कि इसे मत ललचाओ, इसके गले के लिए खट्टा और तीखा मना है। पद्म पुरस्कार की खबर मिलते ही बधाइयों का दौर शुरू आलोक याग्निक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भी हैं। उन्होंने बताया कि जैसे ही पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई, उनके पास बधाई देने वालों के फोन की झड़ी लग गई। सुबह जब वह शाखा पर गए, तब भी यही माहौल था। उन्होंने बताया कि आजकल अलका के कान में थोड़ा इंफेक्शन है, जिसकी वजह से डॉक्टर्स ने उन्हें फोन पर बात करने से मना किया है। इसलिए हमारी व्हाट्सएप के जरिए बात हुई और हमने उन्हें पूरे परिवार की तरफ से बधाई दी। पूरा खानदान इस समय गर्व महसूस कर रहा है। सेलिब्रिटी बनने के बाद भी नहीं बदला अलीगढ़ के लिए प्यार अलका याग्निक भले ही आज वैश्विक स्तर पर मशहूर हैं और उनके गाने दुनिया के 200 से अधिक देशों में गूंजते हैं, लेकिन अलीगढ़ की नुमाइश में वह कई बार परफॉर्म करने आ चुकी हैं। आलोक याग्निक ने उनकी पिछली यात्रा का एक भावुक किस्सा साझा करते हुए बताया कि पिछली बार जब वह अलीगढ़ आई थीं, तो सेलिब्रिटी होने का कोई घमंड नहीं था। वह मेरे भाई के घर गईं और जिद करने लगीं। कहने लगीं कि भैया, मुझे पहले उस पुराने हिस्से में ले चलो, जहां हम बचपन में खिड़की से लटका करते थे और नीचे फर्श पर लेटते थे। उनके भीतर आज भी वही बचपन की मासूमियत जिंदा है।
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अलका याग्निक के लिए घर से जाता था गर्म पानी:अलीगढ़ से है गहरा नाता, पद्म भूषण मिलने पर भाई को मिलने लगीं बधाइयां