उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था इस समय गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है. हाल ही में सामने आई नीति आयोग की रिपोर्ट ने इस स्थिति को लेकर कई चिंताजनक तथ्य उजागर किए हैं. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 2959 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जो केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं. इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ रहा है और छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्रदेश में 39 ऐसे स्कूल हैं, जहां कागजों में 33 शिक्षक तैनात दिखाए गए हैं, लेकिन वहां एक भी छात्र मौजूद नहीं है. यह स्थिति न केवल संसाधनों की बर्बादी को दर्शाती है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की कमजोर निगरानी और योजना क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े करती है.
नीति आयोग ने सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या पर जताई चिंता
नीति आयोग ने सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या पर भी गहरी चिंता जताई है. रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में उच्च प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते 10 में से लगभग 4 बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख कारण आर्थिक बोझ है. दरअसल, शिक्षा का अधिकार (RTE) केवल 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है. इसके बाद माध्यमिक शिक्षा के लिए परिवारों को खुद खर्च उठाना पड़ता है.
कक्षा आठवीं के बाद पढ़ाई जारी रखने के लिए ट्यूशन, यूनिफॉर्म, किताबें और परिवहन जैसे खर्च बढ़ जाते हैं, जो विशेष रूप से कम आय वाले परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं. यही वजह है कि बड़ी संख्या में बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं.
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समस्या पर आयोग ने ‘सिलिंडर मॉडल’ अपनाने की सिफारिश
रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था के वर्तमान ढांचे को भी जिम्मेदार ठहराया गया है. नीति आयोग के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था एक पिरामिड की तरह है, जिसमें प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर तो स्कूलों की संख्या अधिक है, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर स्कूल कम हैं. इस असंतुलन के कारण छात्रों को स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे ड्रॉपआउट की संभावना बढ़ जाती है.
इस समस्या के समाधान के लिए आयोग ने ‘सिलिंडर मॉडल’ अपनाने की सिफारिश की है. इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाए कि जितने बच्चे कक्षा एक में प्रवेश लें, उतने ही बच्चे 12वीं पास करके बाहर निकलें. इसके लिए एकीकृत स्कूल परिसरों की अवधारणा को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जहां कक्षा एक से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई एक ही परिसर में हो.
सरकारी स्कूलों से छात्रों का पलायन भी बनी बड़ी चिंता
सरकारी स्कूलों से छात्रों का पलायन भी एक बड़ी चिंता बनकर उभरा है. आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2005-06 में जहां 71.13 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 तक यह संख्या घटकर 49.24 प्रतिशत रह गई है. यानी अब पहली बार देश में आधे से अधिक बच्चे निजी स्कूलों की ओर रुख कर चुके हैं. यह स्थिति सरकारी शिक्षा व्यवस्था में घटते भरोसे को साफ तौर पर दर्शाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सरकारी स्कूलों की स्थिति और भी खराब हो सकती है. ऐसे में जरूरी है कि शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए, शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति हो और छात्रों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि वे सरकारी स्कूलों की ओर आकर्षित हों और प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाया जा सके.
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