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मणिपुर के उखरुल में उग्रवादी हमले में शहीद हुए असम राइफल्स के हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत का गाजियाबाद के हिंडन घाट पर पूर्ण सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया. भारी बारिश के बावजूद वीर सपूत को विदाई देने हजारों लोग उमड़ पड़े. उत्तराखंड के पौड़ी निवासी चंद्रमोहन के परिवार पर दुखों का दोहरा पहाड़ टूटा है, महज 35 दिन पहले ही उनके पिता का निधन हुआ था. पिता की अंतिम रस्में निभाकर ड्यूटी पर लौटे चंद्रमोहन 6 जुलाई को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर अमर हो गए.
कौन हैं शहीद चंद्रमोहन सिंह? मणिपुर हमले में देश पर जान न्योछावर करने वाले उस जांबाज की कहानी
गाजियाबाद: मणिपुर के उखरुल जिले में उग्रवादियों के कायराना हमले में देश की रक्षा करते हुए असम राइफल्स के जांबाज हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत का गुरुवार को गाजियाबाद के हिंडन घाट पर पूर्ण सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया. देश के इस वीर सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए भारी बारिश के बावजूद हजारों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा. पूरा इलाका ‘भारत माता की जय’ और ‘बलिदानी चंद्रमोहन सिंह रावत अमर रहें’ के गगनभेदी नारों से गूंज उठा. सेना के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर अपने साथी को अंतिम सलामी दी, जिससे वहां मौजूद हर नागरिक की आंखें नम हो गईं.
तिरंगे में लिपटकर जब घर पहुंचा वीर का पार्थिव शरीर
इससे पहले, बुधवार देर रात जैसे ही एक विशेष सैन्य वाहन तिरंगे में लिपटे हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत के पार्थिव शरीर को लेकर गाजियाबाद के नंदग्राम स्थित उत्तरांचल नगर आवास पर पहुंचा, वैसे ही पूरे क्षेत्र में मातम पसर गया. लोग रातभर अपने घरों से बाहर वीर योद्धा के अंतिम दर्शन के लिए खड़े रहे. जैसे ही शव घर के आंगन में रखा गया, शहीद की पत्नी मंजू देवी अपने पति के पार्थिव शरीर से लिपटकर बेसुध हो गईं. वहीं, उनकी दो बेटियां 19 वर्षीय रितिका और 15 वर्षीय यशिका अपने पिता के शव को पकड़कर बिलख-बिलख कर रोने लगीं. वहीं, उनका 24 वर्षीय बड़ा बेटा राहुल, जो नंदग्राम में ही एक छोटी सी स्टेशनरी की दुकान चलाता है, अपनी सुबकियों नहीं रोक पा रहा था.
35 दिनों के भीतर परिवार पर टूटा दुखों का दोहरा पहाड़
शहीद हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत के परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महज 35 दिनों के भीतर इस परिवार ने अपने घर के दो मुख्य स्तंभों को हमेशा के लिए खो दिया. दरअसल, चंद्रमोहन के पिता गोविंद सिंह का निधन पिछले महीने 3 जून को हो गया था. अपने पिता के अंतिम संस्कार और श्राद्ध कर्म में शामिल होने के लिए चंद्रमोहन सेना से छुट्टी लेकर उत्तराखंड स्थित अपने पैतृक गांव आए थे.
पिता की सभी अंतिम रस्मों को पूरा करने के बाद, वह 3 जुलाई को गाजियाबाद से वापस मणिपुर में अपनी ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे. उन्होंने 5 जुलाई को अपनी यूनिट में कार्यभार (ड्यूटी जॉइन) संभाला और इसके अगले ही दिन यानी 6 जुलाई को देश की रक्षा करते हुए वे शहीद हो गए. परिवार को क्या पता था कि जिस बेटे को उन्होंने पिता के अंतिम संस्कार के बाद विदा किया था, वह खुद महज तीन दिन बाद तिरंगे में लिपटकर वापस लौटेगा.
पौड़ी के रहने वाले थे चंद्रमोहन सिंह
हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत असम राइफल्स में हवलदार (जनरल ड्यूटी – GD) के पद पर तैनात थे. वे मूल रूप से देवभूमि उत्तराखंड के पौड़ी जिले के अंतर्गत आने वाले डांडातोली क्षेत्र के कुकलियाल गांव के निवासी थे. हालांकि, साल 2008 से ही उनका परिवार गाजियाबाद में आकर रहने लगा था. पिछले कुछ वर्षों से वे नंदग्राम के उत्तरांचल नगर में अपना मकान बनाकर रह रहे थे. उनके भतीजे आशीष रावत ने बताया कि चाचा के जाने से पूरा परिवार टूट गया है, लेकिन हमें उनकी शहादत पर गर्व भी है.
मणिपुर के उखरुल में कैसे हुआ यह कायराना हमला?
दरअसल, यह दुखद घटना सोमवार, 6 जुलाई की दोपहर करीब 1:50 बजे की है. मणिपुर के उखरुल जिले में नुंगशांग कोंग के पास 40 असम राइफल्स का एक सैन्य काफिला अपनी नियमित और महत्वपूर्ण ड्यूटी पूरी करके शांगशाक बटालियन मुख्यालय की तरफ लौट रहा था. इसी दौरान पहले से घात लगाकर बैठे उग्रवादियों ने सेना के वाहनों को निशाना बनाते हुए आधुनिक स्वचालित हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी और साथ ही शक्तिशाली आईईडी के धमाके किए. इस अचानक और भीषण हमले में असम राइफल्स के दो जांबाज जवान वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह और हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत गंभीर रूप से घायल होने के बाद देश के लिए शहीद हो गए.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें