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Kashi Unique Traditions: धर्म और संस्कृति की नगरी काशी अपने आप में कई ऐसे रहस्य और अजब-गजब रंग समेटे हुए है, जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलते. जहां एक तरफ यहां मोक्ष की चाह में लोग आते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी अनोखी और अकल्पनीय परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जिन्हें देखकर हर कोई हैरान रह जाता है. महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच गूंजती घुंघरूओं की झंकार हो या खौलती हुई खीर से स्नान करने की खौफनाक आस्था काशी के ये चार रंग आपको हैरत में डाल देंगे. आइए जानते हैं काशी की इन हैरतअंगेज परंपराओं के बारे में.
काशी एकमात्र ऐसा शहर है जहां मृत्यु के शोक के बीच भी नृत्य होता है. यहां महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर एक विशेष तिथि पर नगरवधुएं (वेश्याएं) नृत्य करती हैं. यह नजारा जलती चिताओं के बीच पूरी रात निभाया जाता है. एक ओर जहां चिताएं जलती हैं, तो दूसरी तरफ घुंघरूओं की आवाज भी सुनाई देती है. हर साल विशेष तिथि पर इसका आयोजन होता है, जिसका नजारा बेहद अद्भुत होता है.

हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को यह अनोखा नजारा देखने को मिलता है. नगरवधुएं अपने नरकीय जीवन से मुक्ति पाने के लिए महाश्मशान में नृत्य करती हैं. इस दिन पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों से नगरवधुएं बिना किसी आमंत्रण के यहां आती हैं. यह परंपरा राजा मानसिंह के समय से निरंतर चलती चली आ रही है.

वहीं, काशी में गंगा किनारे ‘मूर्खों का मेला’ भी लगता है. सुनने में आपको यह थोड़ा अजीब जरूर लग रहा होगा, लेकिन 1 अप्रैल को हर साल काशी में यह मेला लगता है. इस मेले में लोग एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हैं. इसके लिए अजीबो-गरीब चीजें भी मेले में आपको नजर आती हैं. बताते चलें कि इस मेले में 10 से 15 हजार लोग शामिल होते हैं.
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इस मेले में रात्रि में उल्टे-सीधे तरीके से विवाह होता है. बड़ी बात यह होती है कि इसमें लड़की (दूल्हा) और लड़का (दुल्हन) बनता है. विवाह भी अजब-गजब तरीके से होता है. फिर रात्रि में ही तलाक भी हो जाता है. उसके बाद कवियों की महफिल में कविताओं के जरिए हँसी-ठिठोली चलती है. इस मेले में हर कोई मूर्ख बनने और बनाने के लिए आता है.

काशी में कराहा पूजा की भी अनोखी परंपरा है. विशेष सिद्धि के लिए अलग-अलग जगहों पर इस पूजा को किया जाता है. इस पूजा के दौरान शख्स खौलती खीर से स्नान करता नजर आता है. इसके अलावा जलती कड़ाही से पूड़ी को भी पुजारी हाथों से निकाल कर भक्तों को देता है, जिसे देख हर कोई हैरान हो जाता है.

यादव समाज के लोगों द्वारा यह पूजा की जाती है. इसमें पुजारी (भगत) आग के करीब खुद के शरीर को ले जाता है, लेकिन चमत्कार कहें या कुछ और, इन सब के बाद भी उसे कुछ नहीं होता है. हालांकि, कराहा पूजा की परंपरा काशी के साथ-साथ आस-पास के जिलों में भी देखने को मिल ही जाती है.

इसके अलावा महाश्मशान में चिता के भस्म वाली होली भी सिर्फ और सिर्फ काशी में होती है. इस अनोखी होली में भगवान शिव के भक्त चिताओं की राख से होली खेलते हैं. इस होली में औघड़, तांत्रिक और किन्नर शामिल होते हैं. रंगभरी एकादशी के बाद यह अनोखी होली खेली जाती है.

काशी में चिता भस्म की होली की परंपरा भी काफी पुरानी बताई जाती है. कहते हैं खुद महादेव अपने गणों के साथ यहाँ महाश्मशान में होली खेलते हैं. इस दिन मणिकर्णिका घाट पर कई कुंतल भस्म उड़ाए जाते हैं. इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए देश-विदेश से लोग यहां आते हैं. होली का ऐसा अद्भुत नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलता है.