इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के दालमंडी क्षेत्र में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के समीप सड़क चौड़ीकरण और सुंदरीकरण परियोजना के खिलाफ दायर याचिका को सुनवाई के बाद खारिज कर दिया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को जनहित और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए किसी भी भूमि या धार्मिक संपत्ति का अधिग्रहण करने का संप्रभु अधिकार प्राप्त है। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने सैयद रशीद अली व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य में अपर महाधिवक्ता एमसी चतुर्वेदी, एडिशनल सीएससी सुरेश सिंह, नगर निगम वाराणसी के अधिवक्ता विनीत संकल्प और वीडीए के अधिवक्ता को सुनकर दिया है। जानिये क्या है मामला दालमंडी मार्केट के छह दुकानदारों, जो किराएदार हैं ने याचिका में दालमंडी स्थित उनकी दुकानों और भवनों से मनमाने ढंग से बेदखल न करने, प्रशासन द्वारा बलपूर्वक बेदखली या पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जरिए किसी भी तरह का उत्पीड़न रोकने और क्षेत्र में स्थित छह प्राचीन मस्जिदों (अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रज़ा खान, मस्जिद करीमुल्लाह बेग, मस्जिद निसारन और मस्जिद संगमरमर) को ढहाने या उनका स्वरूप बदलने से रोकने की मांग की थ। याचियों का तर्क था कि दालमंडी मुस्लिम बहुल और बेहद पुराना व्यस्त बाजार है।
चौड़ीकरण के लोक निर्माण विभाग के 21,588.24 लाख के बजट वाले प्रोजेक्ट से हजारों लोगों की आजीविका छिन जाएगी। साथ ही उन्होंने ‘पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 का हवाला देकर मस्जिदों के अधिग्रहण को अवैध बताया था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता केवल किराएदार हैं और उनके पास रेंट एग्रीमेंट या बिजली बिल जैसी सीमित चीजें हैं। लंबे समय से व्यापार करने मात्र से उनका अधिकार मालिकाना हक में नहीं बदल जाता। भूमि अधिग्रहण कानून (अधिनियम 2013) के तहत मुख्य रूप से संपत्ति के वास्तविक मालिक को ही आपत्ति जताने या मुआवजे की बातचीत करने का अधिकार होता है। संपत्ति मालिकों ने इस परियोजना पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। धार्मिक स्थल को लेकर दलीलें याचिकाकर्ताओं के सबसे बड़े तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि 1991 का अधिनियम राज्य सरकार के भूमि अधिग्रहण के अधिकार को नहीं रोकता। इस अधिनियम का एकमात्र उद्देश्य किसी सार्वजनिक पूजा स्थल को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित होने से रोकना है। यह अधिनियम धर्मनिरपेक्ष और सार्वजनिक उद्देश्यों जैसे सड़क चौड़ीकरण या बुनियादी ढांचे के विकास के लिए राज्य द्वारा किए जाने वाले वैध अधिग्रहण के खिलाफ कोई सुरक्षा कवच या ढाल नहीं है। ऐतिहासिक फैसलें का जिक्र हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ द्वारा डॉ एम इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ (1994) मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि मस्जिद सहित कोई भी अचल संपत्ति राज्य द्वारा अधिग्रहित की जा सकती है। मस्जिद को अन्य धर्मों के पूजा स्थलों से अलग कोई विशेष संवैधानिक छूट प्राप्त नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधित वक्फ अधिनियम की धारा 51 और 91 भी जनहित में वक्फ बोर्ड की सलाह से भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत संपत्तियों के अधिग्रहण की अनुमति देती है। मस्जिदों के प्रबंधन (मुतवल्ली) या वक्फ बोर्ड ने सीधे तौर पर इस पर आपत्ति नहीं जताई है इसलिए दुकानदारों द्वारा इस मुद्दे को उठाना प्रासंगिक नहीं है। सरकारी वकील ने पक्ष रखा सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता महेश चंद्र चतुर्वेदी ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि प्रशासन किसी को अवैध रूप से बेदखल नहीं कर रहा है। आपसी सहमति के आधार पर सेल डीड निष्पादित कर जमीनें ली जा रही हैं, और जो लोग सहमत नहीं हैं उनके लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत धारा 11 की अधिसूचना जारी कर उचित मुआवजे और पुनर्वास की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। वहीं, जर्जर भवनों पर नगर निगम और वाराणसी विकास प्राधिकरण अपने नियमों के तहत कार्रवाई कर रहे हैं।
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दालमंडी के दुकानदारों की याचिका हाईकोर्ट से खारिज:काशी विश्वनाथ कॉरिडोर : हाईकोर्ट ने कहा- सार्वजनिक हित में धार्मिक स्थल का अधिग्रहण संभव