इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मंगलवार एक अनोखी जनहित याचिका को यह कहते हुए निपटा दिया कि याचिकाकर्ता ने गलत अदालत का दरवाजा खटखटाया है. कोर्ट ने कहा कि मामला जितना संजीदा था, उसकी भाषा उतनी ही चटपटी.
दरअसल, बेंगलुरू निवासी एस. विग्नेश शिशिर ने केंद्र सरकार समेत 21 प्रतिवादियों के खिलाफ यह याचिका दायर की थी. निशाने पर थे अभिजीत दीपके जो पुणे, महाराष्ट्र के रहने वाले, फिलहाल अमेरिका में जिन्होंने एक अपंजीकृत संगठन ‘काक्रोच जनता पार्टी’ की स्थापना की है.
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देश की अखंडता को नुकसान- याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता का दावा था कि यह संगठन विदेशी और ‘डीप स्टेट’ फंडेड है, जिसे राष्ट्र-विरोधी तत्वों ने भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने के लिए खड़ा किया है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल, ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म्स पर चलाए जा रहे अकाउंट के जरिए ‘जेन-जी यानी युवा पीढ़ी’ को भड़काया जा रहा है.
‘कर्नाटक हाईकोर्ट जाएं’
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने याचिका पढ़ते ही पूछा. याचिकाकर्ता तो बेंगलुरू का है. कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा उठाने वाले बेंगलुरू निवासी को पहले कर्नाटक हाई कोर्ट जाना चाहिए था.
पहले बताया था बेंगलुरू निवासी
इस दौरान कोर्ट में याचिकर्ता और न्यायाधीशों के बीच तीखी बहस हुई, जो शायद ही कोई वकील कर सकता है. दिलचस्प यह रहा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने लखनऊ के पते से शिकायतें की हैं, लेकिन कोर्ट ने याद दिलाया कि वे पहले भी इसी पीठ के सामने आए थे और खुद को बेंगलुरू का निवासी बताते हुए अदालत से विशेष सहानुभूति मांगी थी.
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— ABP News (@ABPNews) June 2, 2026
याचिका वापस ली
जैसे ही कोर्ट ने अधिकारिता का मुद्दा उठाया, याचिकाकर्ता ने तत्काल याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, इस स्वतंत्रता के साथ कि वे सक्षम अदालत में नई याचिका दाखिल कर सकें. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा होने के बावजूद याचिकाकर्ता को सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट जाना चाहिए था.
कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली, जिसके बाद अदालत ने उन्हें सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत में नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हुए मामला निपटा दिया.
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